कर्मों का हिसाब

किसी नगर में एक सेठ रहता था।
समय के फेरे से वह अत्यंत गरीब हो गए । पुनः समृद्धि के लिए हमेशा गोपाल सहस्रनाम का पाठ, अर्चना आदि किया करते।
भगवान से प्रार्थना करते , हे प्रभो ! आप कृपा करके मुझे पुनः धन-धान्य से पूर्ण का दें, मैं दान, दक्षिणा यज्ञ, सदाव्रत, साधु-सेवा आदि पुण्य कर्म करूंगा, आपकी सेवा करूंगा।
भगवान ने उस सेठ की सुन ली और उसे दिन-दूना और रात-चैगुना लाभ देकर नगर का सबसे बड़ा सेठ बना दिया।
परंतु धनवानबनते ही वह अपने सभी बातों को भूलकर धन के मद में चूर रहने लगा।
भगवान् को उठाकर ऊपर ताख में रख दिया और पूजा गृह को अन्न का गोदाम बना दिया। अपने सभी संकल्पको भूल गया ।
“जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई ” की धारा में वह सेठ बह गया।
भगवान ने सोचा-अच्छा भगत मिला। इसने तो मुझे भी धोखा दे दिया अब तो, इसे शिक्षा अवश्य देनी चाहिए।



ऐसा सोच कर प्रभु एक साधु का रूप धारण कर उस सेठ की दुकान पर आए और राधेश्याम सीताराम की रट लगाई।
सेठ सबेरे-सबेरे उस सन्त के रूप में भगवान को देखते ही जल भुन गया।
सोचा सबेरा होते ही मांगने के लिए आ पहुंचा और नौकरों द्वारा धक्का दिलाकर साधु वेषधारी भगवान् को भगा दिया।
भगवान को अपनी माया की प्रबलता पर हंसी आई तथा जीव के अज्ञान पर क्षोभ भी हुआ और उन्होंने उसे चैतन्य करने के लिए कठोर कदम उठाने का संकल्प लिया।
जब सेठजी स्नान करने गए , तब भगवान ने उस सेठ का रूप धारण किया और सेठ के घर पहुँच गये । सेठ के बच्चों , नौकर-चाकरों को बुलाकर सावधान कर दिया कि “एक बहुरूपिया मेरा ही रूप धारण किए हुए इधर को ही आ रहा है, उससे सावधान रहना घर में प्रवेश नहीं करने देना।”
उसके लाख सौगंध खाने पर भी विश्वास नहीं करना, यदि जोर करे तो जूतों से मारकर नगर से बाहर कर देना।



ऐसा ही हुआ सेठजी के आते ही बालक, बूढ़े, नौकर-चाकर सब टूट पड़े और अत्यंत तिरस्कार पूर्वक उसे नगर के बाहर कर दिया।
तिरस्कृत सेठजी एक वृक्ष के नीचे बैठकर अपनी तकदीर पर रो रहे थे।
भगवान् पुनः उसी संत के वेष में वहां पहुंचे और उसकी दुर्दषा पर अत्यंत खेद प्रकट करते हुए उन्हें कृपा करके ज्ञानोपदेष किया।
सेठ की आंखें खुली, वह उस साधु वेषधारी भगवान के चरणों में गिर पड़ा और ‘संपत्ति सब रघुपति के आही’ का संकल्प करते हुए, संत भगवन्त् सेवा व्रत लेकर उसने अपना शेष जीवन हरि स्मरण में बिताया।
तो इस प्रकार हरि से असांचे (झूठे) नहीं होना चाहिए।
प्रभु को दिया हुआ वचन हमें हर हाल में याद रखना चाहिए क्योंकि अंत में इहलोक से परलोक जाने के बाद उसी को हमें अपने कर्मों का हिसाब चुकाना है।
कम से कम उसके साथ तो सांसारिकता से ऊपर रहना चाहिए।
कारण वहां किसी प्रकार का छल, कपट, माया आदि का कुछ नहीं चलता है। अतः हमें हर हाल में भगवान् के प्रति समर्पित और इमानदार होना चाहिए।