कार्तिक व्रत के उद्यापन की विधि

कार्तिक मास के व्रत के उद्यापन में तुलसी के मूल प्रदेश में भगवान विष्णु की पूजा का विधान है. व्रती मनुष्य को कार्तिक शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को व्रत की पूर्त्ति तथा भगवान विष्णु की प्रसन्नता के लिए उद्यापन करना चाहिए. उद्यापन करने वाले व्यक्ति को तुलसी के ऊपर एक सुन्दर मण्डप बनाना चाहिए, जिसमें चार दरवाजे होने चाहिए. फिर उस मण्डप में सुन्दर बन्दनवार लगाकर उसे पुष्पों के चँवर से सजाना चाहिए. चारों द्वारों पर पृथक-पृथक मिट्टी के चार द्वारपालों – पुण्यशील, सुशील, जय और विजय – की स्थापना करके उनका पूजन करना चाहिए.
तुलसी की जड़ के पास सर्वतोभद्र मण्डल बनाना चाहिए जो चार रंगों से बना हुआ सुन्दर लगना चाहिए. सर्वतोभद्र के ऊपर कलश स्थापित करना चाहिए और उस पर नारियल रखना चाहिए. कलश स्थापना के बाद लक्ष्मी जी के साथ विराजमान शंख, चक्र, गदायुक्त भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए. मण्डल में इन्द्र आदि लोकपालों का भी पूजन करना चाहिए. भगवान द्वादशी को शयन से उठे, त्रयोदशी को देवताओं ने उनका दर्शन किया, चतुर्दशी को सबने उनकी पूजा की इसलिए इस समय भी उसी तिथि को भगवान की पूजा की जाती है.
इस दिन शान्त तथा शुद्ध मन से श्रद्धापूर्वक उपवास करना चाहिए. रात्रि में जागरण करना चाहिए. भगवान के पास भक्तिपूर्वक गायन करते हुए जागरण करने से सौ जन्मों के पापों का नाश हो जाता है. इसके बाद पूर्णिमा के दिन सुबह के समय अपनी सामर्थ्य अनुसार पत्नी सहित अधिक से अधिक ब्राह्मणों को भोजन के लिए आमन्त्रित करना चाहिए. इस दिन दान, होम तथा जप से अक्षय फल की प्राप्ति होती है. इसलिए व्रती मनुष्य को ब्राह्मणों को खीर आदि मिष्टान्न से युक्त भोजन करवाना चाहिए.
देवताओं की प्रसन्नता के लिए तिल व खीर की आहुति देनी चाहिए. ब्राह्मणों को दक्षिणा देनी चाहिए और देवगणों सहित भगवान विष्णु तथा तुलसी जी का पूजन करना चाहिए. व्रत का उपदेश करने वाले आचार्य का पूजन करके उन्हें वस्त्र, अलंकार भेंट देने चाहिए. अन्त में ब्राह्मणों से प्रार्थना करनी चाहिए कि हे विप्रों ! आप सबकी कृपा से भगवान विष्णु मुझ पर सदा प्रसन्न रहें और इस व्रत के प्रभाव से पूर्व जन्मों में किए हुए मेरे सभी पाप नष्ट हो जाएँ. भगवान के पूजन से मेरे सभी मनोरथ पूर्ण हों और अन्त में वैकुण्ठ धाम की प्राप्ति हो.
इस प्रकार प्रार्थना करते हुए ब्राह्मणों को विदा करना चाहिए. उसके बाद सपरिवार भोजन ग्रहण करना चाहिए. इस प्रकार कार्तिक मास के व्रत का पालन करने वाला मनुष्य निष्पाप तथा मुक्त होकर भगवान विष्णु की समीपता प्राप्त कर लेता है. कार्तिक व्रत के इन नियमों का प्रचार करने वाले व्यक्ति के भी सभी पाप नष्ट हो जाते हैं.