महाभागवत – देवीपुराण

महाभागवत – देवीपुराण – पहला अध्याय
श्रीगणेश जी को नमस्कार है।। श्रीगणेश जी के चरण कमल के परागकण, जो देवेन्द्र के मस्तक पर विराजमान मन्दार-पुष्प के परागकणों के समान अरुणवर्ण के हैं, वे विघ्नों का नाश करें ।।1।। नारायण, नरश्रेष्ठ श्रीनर, भगवती सरस्वती और व्यास जी को नमस्कार करके जय (पुराण एवं इतिहास आदि ग्रन्थों) का पाठ करना चाहिए ।।2।। जिनकी आराधना करके स्वयं ब्रह्माजी इस जगत के सृजनकर्ता हुए, भगवान विष्णु पालनकर्त्ता हुए तथा भगवान शिव संहार करने वाले हुए, योगिजन जिनका ध्यान करते हैं और तत्त्वार्थ जानने वाले मुनिगण जिन्हें परा मूलप्रकृति कहते हैं – स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करने वाली उन जगज्जननी भगवती को मैं प्रणाम करता हूँ ।।3।। जिन्होंने स्वेच्छा से इस जगत की सृष्टि करके तथा स्वयं जन्म लेकर भगवान शिव को पतिरूप में प्राप्त किया और शम्भु ने कठोर तपस्या से जिन्हें पत्नी रूप में प्राप्त कर जिनका चरण अपने हृदय पर धारण किया, वे भगवती आप सबकी रक्षा करें ।।4।। एक बार नैमिषारण्य में शौनक आदि महर्षियों ने वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ मुनिवर सूत जी से पूछा – महामते ! अब आप स्वर्ग तथा मोक्ष का सुख प्रदान करने वाले उस पुराण का वर्णन कीजिए, जिसमें भगवती की उत्तम महिमा का अत्यन्त विस्तार से वर्णन किया गया है और जिसके यथाविधि श्रवण करने से दिव्य ज्ञान से रहित मनुष्यों में भी नवधा भक्ति उत्पन्न हो जाती है ।।5-7।।
सूतजी बोले – महाभागवत नामक इस अत्यन्त गोपनीय पुराण का वर्णन सर्वप्रथम भगवान शिव ने महात्मा नारद के लिए किया था ।।8।। पूर्वकाल में उसे फिर स्वयं भगवान व्यास ने भक्तिनिष्ठ महर्षि जैमिनि के लिए श्रद्धापूर्वक कहा था और फिर उसी को मैं आप लोगों से कह रहा हूँ. इसे प्रयत्नपूर्वक गोपनीय रखना चाहिए तथा कभी भी प्रकट नहीं करना चाहिए. इसके श्रवण करने तथा पाठ करने में द्विज को जो पुण्य प्राप्त होता है, भगवान शिव भी सौ वर्षों में उस पुण्य का वर्णन करने में समर्थ नहीं हैं तो फिर मैं उसका वर्णन कैसे कर पाऊँगा? क्योंकि वह पुण्य़ असीम है ।।9-11।। यह सुनकर सभी ऋषिगण विस्मित एवं अत्यन्त हर्षित हुए. उन श्रेष्ठ मुनियों ने वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ सूत जी से पुन: कहा – ।।12।।
ऋषिगण बोले – मुनिवर ! जिस तरह से वह श्रेष्ठ पुराण इस पृथ्वी लोक में प्रकाशित हुआ, आप कृपा करके इसका यथार्थ रूप में वर्णन कीजिए.।।13।।
सूतजी बोले – समस्त धर्मशास्त्रों के वक्ता, सभी वेदविदों में श्रेष्ठ, धर्मज्ञ, ज्ञानसंपन्न, महान बुद्धि वाले, महामुनि भगवान महर्षि व्यास जी अठारह पुराणों की रचना करने पर भी किसी प्रकार से संतुष्ट नहीं हुए ।।14-15।। उन्हें चिन्ता हुई कि “यह महापुराण परम श्रेष्ठ है, जिससे बढ़कर दूसरा कुछ भी इस पृथ्वीतल पर नहीं है. भगवती का परम तत्त्व तथा विस्तृत माहात्म्य इसमें विद्यमान है, देवी तत्त्व से अनभिज्ञ मैं इसका वर्णन कैसे कर सकूँगा” – ऎसा सोचकर उनके मन में बड़ा क्षोभ हुआ. महाज्ञानी महेश्वर शिव जिनके तत्त्व को भली भाँति नहीं जानते हैं, जिनके परम तत्त्व को जान पाना अत्यन्त कठिन है – ऎसा विचारकर परम बुद्धिमान तथा दुर्गाभक्तिपरायण व्यासजी ने हिमालय पर्वत पर जाकर कठोर तपस्या की ।।16-19।।
उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भक्तों से स्नेह रखने वाली भगवती शर्वाणी ने अदृश्य रूप से आकाश में स्थित होकर उनसे यह वचन कहा -।।20।। महामुने ! जहाँ ब्रह्मलोक में समस्त श्रुतियाँ विद्यमान थीं, आप वहाँ पर जाइए. वहाँ आप मेरे सम्पूर्ण परम तत्त्व को जान लेगें. वहाँ श्रुतियों के द्वारा मेरी स्तुति किए जाने पर मैं प्रकट होऊँगी और आपकी जो भी अभिलाषा होगी, उसे पूर्ण करूँगी।।21-22।। तदनन्तर भगवती की आकाशवाणी सुनकर महर्षि व्यास जी ब्रह्मलोक गये. वहाँ उन्होंने वेदों को प्रणाम करके पूछा – अविनाशी ब्रह्मपद क्या है? विनय से नम्र महर्षि का यह वचन सुनकर एक-एक करके सभी वेदों ने तत्काल मुनिश्रेष्ठ व्यास जी से कहा – ।।23-24।।
ऋग्वेद ने कहा – सभी प्राणी जिनके भीतर स्थित हैं और जिनसे सम्पूर्ण जगत प्रकट होता है तथा जिन्हें परम तत्त्व कहा गया है, वे साक्षात स्वयं भगवती ही हैं ।।25।।
यजुर्वेद ने कहा – सभी प्रकार के यज्ञों से जिनकी आराधना की जाती है, जिसके साक्षात हम प्रमाण हैं, वे एकमात्र भगवती ही हैं ।।26।।
सामवेद ने कहा – जो इस समग्र जगत को धारण करती हैं तथा योगिजन जिनका चिन्तन करते हैं और जिनसे यह विश्व प्रकाशित है, वे एकमात्र भगवती दुर्गा ही इस जगत में व्याप्त हैं ।।27।।
अथर्ववेद ने कहा – भगवती के कृपापात्र लोग भक्तिपूर्वक जिन देवेश्वरी का दर्शन करते हैं, उन्हीं भगवती दुर्गा को लोग परम ब्रह्म कहते हैं ।।28।।
सूतजी बोले – वेदों का यह कथन सुनकर सत्यवती पुत्र व्यास जी ने निश्चित रूप से मान लिया कि भगवती दुर्गा ही परम ब्रह्म है ।।29।। ऎसा कहकर उन वेदों ने महामुनि व्यास जी से पुन: कहा – जैसा हम लोगों ने कहा है, वैसा हम प्रत्यक्ष दिखाएँगे ।।30।। ऎसा कहकर सभी श्रुतियाँ सच्चिदानन्द विग्रहवाली, शुद्धस्वरूपा तथा सर्वदेवमयी परमेश्वरी का स्तवन करने लगीँ ।।31।।
वेदों ने कहा – दुर्गे ! आप सम्पूर्ण जगत पर कृपा कीजिए. परमे ! आपने ही अपने गुणों के द्वारा स्वेच्छानुसार सृष्टि आदि तीनों कार्यों के निमित्त ब्रह्मा आदि तीनों देवों की रचना की है, इसलिए इस जगत में आपको रचने वाला कोई भी नहीं है. माता ! आपके दुर्गम गुणों का वर्णन करने में इस लोक में भला कौन समर्थ हो सकता है ।।32।। भगवान विष्णु आपकी आराधना के प्रभाव से ही दुर्जय दैत्यों को युद्ध स्थल में मारकर तीनों लोकों की रक्षा करते हैं. भगवान शिव ने भी अपने हृदय पर आपका चरण धारण कर तीनों लोकों का विनाश करने वाले कालकूट विष का पान कर लिया था. तीनों लोकों की रक्षा करने वाली अम्बिके ! हम आपके चरित्र का वर्णन कैसे कर सकते हैं ।।33।।
जो अपने गुणों से माया के द्वारा इस लोक में साकार परम पुरुष के देहस्वरूप को धारण करती हैं और जो पराशक्ति ज्ञान तथा क्रियाशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित हैं, आपकी उस माया से विमोहित शरीरधारी प्राणी भेदज्ञान के कारण सर्वान्तरात्मा के रूप में विराजमान आपको ही पुरुष कह देते हैं, अम्बिके ! उन आप महादेवी को नमस्कार है।।34।। स्त्री-पुरुष रूप प्रमुख उपाधि समूहों से रहित जो परब्रह्म है, उसमें जगत सृष्टि के निमित्त सर्वप्रथम सृजन की जो इच्छा हुई, वह स्वयं आपकी ही शक्ति से हुई और वह पराशक्ति भी स्त्री-पुरुष रूप दो मूर्त्तियों में आपकी शक्ति से ही विभक्त हुई है. इस कारण वह परब्रह्म भी मायामय शक्तिस्वरुप ही है. जिस प्रकार जल से उत्पन्न ओले आदि को देखकर मान्यजनों को यह जल ही है – ऎसा ध्रुव निश्चय होता है, उसी प्रकार ब्रह्म से ही उत्पन्न इस समस्त जगत को देखकर यह शक्त्यात्मक ब्रह्म ही है – ऎसा मन में विचार होता है और पुन: परात्पर परब्रह्म में जो पुरुषबुद्धि है, वह भी शक्ति स्वरुप ही है – ऎसा निश्चित होता है.
जगदम्बिके ! देहधारियों के शरीर में स्थित षट्चक्रों (मूलाधार चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र, मणिपूर चक्र, अनाहत चक्र, विशुद्धाख्य चक्र तथा आज्ञाचक्र) में ब्रह्मादि जो छ्: विभूतियाँ सुशोभित होती हैं, वे प्रलयान्त में आपके आश्रय से ही परमेशपद को प्राप्त होती है. इसलिए शिवे ! शिवादि देवों में स्वयं की ईश्वरता नहीं है, अपितु वह तो आप में ही है. देवि ! एकमात्र आपके चरणकमल ही देवताओं के द्वारा वन्दित हैं. दुर्गे ! आप हम पर प्रसन्न हों ।।35-37।।
सूतजी बोले – इस प्रकार श्रुतियों के द्वारा वेदवचनों से स्तुत की गई सनातनी जगदम्बा सती ने अपना स्वरुप दिखाया ।।38।। सभी प्राणियों के भीतर स्थित रहने वाली उन ज्योति स्वरुपिणी भगवती ने व्यास जी के संशय का नाश करने के लिए इच्छारूप धारण किया. उनकी आकृति हजारों सूर्यों की प्रभा से युक्त थी, करोड़ों चन्द्रमाओं की कान्ति से सुशोभित हो रही थी, हजारों भुजाओं से सम्पन्न थी, दिव्य शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित थी, दिव्य अलंकारों से शोभायमान थी एवं उनके शरीर पर दिव्य गन्धों का लेप लगा हुआ था, वे सिंह की पीठ पर विराजमान थीं और कभी-कभी शव पर सवार भी दिखाई पड़ती थी. ।।39-41।।
वे भगवती चार भुजाओं से सुशोभित थीं, उनके शरीर की प्रभा नवीन मेघ के समान थी, वे क्षण-क्षण में कभी दो, कभी चार, कभी दस, कभी अठारह, कभी सौ तथा कभी अनन्त भुजाओं से युक्त होकर दिव्य रूप धारण कर लेती थी ।।42-43।। वे कभी विष्णुरूप में होकर उनके वाम भाग में लक्ष्मी का रूप धारण करके विराजमान दिखाई पड़ती थीं, कभी राधासहित कृष्ण के रूप में हो जाती थीं, कभी स्वयं ब्रह्मा का रूप धारण करके उनके वाम भाग में सरस्वती के रूप में दृष्टिगत होती थीं और कभी शिव का रूप धारण कर उनके वाम भाग में गौरीरूप में स्थित हो जाती थीं. इस प्रकार उन सर्वव्यापिनी ब्रह्मस्वरुपिणी भगवती ने अनेक प्रकार के रूप धारण कर व्यास जी का संशय दूर कर दिया ।।44-46।।
सूत जी बोले – इस प्रकार पराशर पुत्र व्यासजी भगवती का दर्शन करके उन्हें परम ब्रह्म के रूप में जानकर जीवन्मुक्त हो गए ।।47।। तदनन्तर भगवती ने उनकी अभिलाषा जानकर उन्हें अपने चरणतल में स्थित कमल के दर्शन कराए. मुनि व्यास जी ने उस कमल के हजार दलों में परमाक्षरस्वरूप महाभागवत नामक पुराण को देखा. द्विजों ! तब सिर झुकाकर स्तुति करते हुए देवी को सादर प्रणाम करके कृतकृत्य होकर वे महर्षि व्यास जी अपने आश्रम चले गए ।।48-50।।
उन्होंने भगवती के चरणों में स्थित कमल में परमाक्षर स्वरुप पवित्र महाभागवत पुराण का जिस रूप में दर्शन किया था, उसी रूप में उसे प्रकाशित किया. उन्होंने अत्यन्त स्नेहपूर्वक मुझे वह पुराण सुनाया और मैंने उसे सुना तथा सम्यक रूप से हृदय में धारण किया. अब मैं स्नेह के कारण आप लोगों से उस पुराण का वर्णन करूँगा, आप लोग प्रयत्नपूर्वक इसे गुप्त रखियेगा ।।51-52।। हजारों अश्वमेधयज्ञ तथा सैकड़ों वाजपेययज्ञ इस महाभागवत पुराण की सोलहवीं कला के भी तुल्य नहीं हैं. इस प्रकार महापात की प्राणियों की भी रक्षा के लिए इस भूलोक में महाभागवतपुराण प्रकाशित हुआ ।।53-54।।
।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीसूत-शौनक-वाक्य में “महाभागवतप्रकाशन” नामक पहला अध्याय पूर्ण हुआ।।

महाभागवत – देवीपुराण – दूसरा अध्याय
इस अध्याय में महामुनि जैमिनि द्वारा श्रीवेदव्यास जी से शिव-नारद-संवाद के रूप में वर्णित देवी के माहात्म्य वाले महाभागवत को सुनाने की प्रार्थना करना है.
सूतजी बोले – बहुत से पौराणिक आख्यानों का श्रवण (सुनना) कर लेने के बाद मुनिश्रेष्ठ जैमिनि ने भूमि पर दण्ड की भाँति गिरकर व्यास जी को प्रणाम करके उनसे आदरपूर्वक पूछा !!1।।
जैमिनि बोले – समस्त वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ मुनिवर ! आपको नमस्कार है. महामते ! इस लोक में आपसे बढ़कर वक्ता और कोई नहीं है।।2।। मुने ! आपके मुखारविन्द से पुण्यमयी कथा सुनकर मैं कृतार्थ हो गया हूँ, कृतार्थ हो गया हूँ, कृतार्थ हो गया हूँ, इसमें कोई संदेह नहीं है।।3।। अब एक दूसरी बात जो मेरे मन में चिरकाल से स्थित है, उसके विषय में सुनना चाहता हूँ. जगत के आदि में उत्पन्न, भक्तों के दुर्गम कष्टों को दूर करने वाली, तीनों लोकों की माता, नित्यस्वरुपा, सच्चिदानन्दस्वरुपिणी जो भगवती दुर्गा हैं, ब्रह्मा आदि देवताओं के लिए भी दुर्लभ जिनके दोनों चरणाविन्दों को अपने हृदय कमल पर धारण करते हुए विश्वेश्वर शिव शवरूप से स्थित हैं, उनके अनुपम माहात्म्य का आपने जो संक्षेप में वर्णन किया है, उससे मेरी तृप्ति नहीं हुई है. अत: महाभाग ! अब आप उसका विस्तार से वर्णन करने की कृपा कीजिए. मुनिश्रेष्ठ ! आपको नमस्कार है ।।4-7।।
यह मनुष्य शरीर अत्यन्त दुर्लभ है. अनेक सैकड़ों जन्मों के बाद इसे प्राप्त कर जिसने उस भगवाती माहात्म्य का श्रवण नहीं किया, उसका जीवन व्यर्थ है।।8।। उनका वह वचन सुनकर सत्यवतीपुत्र व्यासजी ने मुनिवर जैमिनि की प्रशंसा करके उनसे कहा ।।9।।
व्यासजी बोले – महामति ! जैमिनि ! आप परम भक्ति तथा ज्ञान से युक्त हैं. वत्स ! आपने इस समय बड़ी ही कल्याणप्रद बात पूछी है, इसके लिए आप साधुवाद के पात्र हैं।।10।। जिनका श्रवण करके भक्ति और धर्म से शून्य महान पापी मनुष्यों का भी इस लोक में पुनर्जन्म नहीं होता और जिसे सुनकर पापी मनुष्य ब्रह्महत्या आदि पातकों से भी छूट जाता है, उस कथा को आप सुनना चाहते हैं, अत: आप परम भाग्यशाली हैं ।।11-12।। मुने ! ब्रह्महत्या अदि समस्त पाप भी तभी तक मनुष्य को ग्रस्त किए रहते हैं, जब तक भगवती का चरित्र उसके कान में पड़ नहीं जाता है. यदि सैकड़ों पाप किया हुआ मनुष्य भी इस दुर्गा चरित्र का श्रवण करता है तो उसे देखकर यमराज भी अपना दण्ड छोड़कर उसके चरणों पर गिर पड़ते हैं।।13-14
मुने ! उन भगवती के अतुलनीय माहात्म्य को बता सकने में भला कौन समर्थ है? जिस माहात्म्य का अपने पाँच मुखों से भगवान शंकर भी वर्णन नहीं कर सके हैं।।15।। वाराणसी क्षेत्र में भगवान शिव स्वयं उन भगवती का ही ब्रह्मसंज्ञक तारक महामन्त्र जो गुरुकृपा से मुझे प्राप्त हुआ, उसे तत्परतापूर्वक आकर मुमुक्षुजनों के कान में कहते हुए उन्हें निर्वाण नामक महामोक्षपद प्रदान करते हैं. ब्रह्मर्षि जैमिनि ! मोक्ष तथा निर्वाणपद प्रदान करने वाली वे भगवती सभी मन्त्रों की एकमात्र बीजस्वरुपिणी हैं. महामते ! सभी वेद मोक्ष प्रदान करने वाली उन भगवती को वहाँ के समस्त मन्त्रों की अधिष्ठात्री देवता कहते हैं ।।16-19।।
शशक (खरगोश), मशक (मच्छर) आदि तथा और भी जो अन्य प्राणी इस पृथ्वी पर हैं, उन्हें मोक्ष देने के लिए भगवान शिव वाराणसीपुरी में “दुर्गा” – यह तारक मन्त्र कान में स्वयं प्रदान करते हैं. मुनिश्रेष्ठ जैमिनि ! एकाग्रचित्त होकर आप उसे सुनिए।।20-21।
मैं शिव-नारद-संवादरूप महान पापों का नाश करने वाले अतुलनीय दुर्गामाहात्म्य का विशेष विस्तार के साथ वर्णन करूँगा ।।22।।
एक समय की बात है – सभी देवतागण मन्दर पर्वत पर एकत्र हुए थे. वहाँ पर गन्धर्वों सहित सभी ऋषिगण भी आये हुए थे. अनेक प्रकार के वृक्षों से व्याप्त, सुगन्धित और विकसित पुष्पों की गन्ध से दिशाओं को सुरभित करने वाले और सुमेरु शिखर के समान प्रतीत होने वाले उस रमणीक गिरिश्रेष्ठ मन्दराचल के पृष्ठ पर बैठे हुए भगवान कृष्ण और भगवान शिव को देखकर महर्षि नारद मुनि ने हाथ जोड़कर विनम्रतापूर्वक भगवान शिव से पूछा ।।23-25½।।
नारदजी बोले – भक्तों पर कृपा करने वाले तथा तीनों लोकों में वन्दनीय देवेश ! ज्ञानियों में श्रेष्ठ और विशुद्ध आत्मा वाले आप ही ब्रह्म नाम से जाने जाते हैं. परमेश्वर ! केवल आप ही वास्तविक तत्त्व को जानते हैं. आप तीनों लोकों को पवित्र करने वाली गंगा जी को आदरपूर्वक अपने सिर पर धारण करते हैं और चन्द्रमा को अत्यन्त सुन्दर देखकर आपने उन्हें अपने सिर का आभूषण बनाया है. सर्वज्ञ ! इस समय मैं आपसे जो पूछ रहा हूँ, उसे आप मुझे बताने की कृपा करें।।26-29।।
महेश्वर ! स्वयं आप, भगवान विष्णु और जगत्पति ब्रह्मा – इन देवताओं की भक्तिपूर्वक उपासना करने से परम पद प्राप्त होता है तो फिर तप के द्वारा आप लोगों का उपास्य देवता कौन है? आपके समान इस बात को वाणी से बताने में इस भूमण्डल में और कोई भी समर्थ नहीं है. कृपामूर्ति महेश्वर ! इस प्रकार के प्रभाव वाले आप लोगों के जो उपास्य देवता हैं, उनके विषय में मुझे भी अवश्य जान लेना चाहिए. अत: कृपापूर्वक मुझे बताइए।।30-32।।
व्यासजी बोले – मुनिश्रेष्ठ जैमिनि ! इस प्रकार उन देवर्षि नारद का वचन सुनकर और उस पर बार-बार विचार करके महादेवजी ने उनसे यह कहा ।।33।।
श्रीमहादेवजी बोले – तात ! आपने जो बात पूछी है, वह तो परम गोपनीय है. वत्स ! ऎसी बात भला आपको बताने योग्य क्यों नहीं है? मुनिश्रेष्ठ ! मैं आपको बताऊँगा।।34।।
व्यासजी बोले – देवाधिदेव शिव के ऎसा कहने पर देवर्षि नारदजी दोनों हाथ जोड़कर खड़े हो गए और सर्वव्यापी जगन्नाथ नारायण से कहने लगे – भक्तों पर कृपा करने वाले देवाधिदेव भगवान महेश्वर अपने उपास्य इष्टदेव के विषय में बताने में कृपणता कर रहे हैं, अत: शरणागतों पर कृपा करने वाले देवेश ! आप उनसे कहने की कृपा करें।।35-36½ ।।
श्रीनारायण बोले – तात ! उस देवता से आपका क्या प्रयोजन? आप सबके देवता तो हम हैं ही. हमारी ही आराधना करके आप परम पद प्राप्त कर लेगें, अत: हम सबके देवता से आपका क्या प्रयोजन?।।37-38।।
व्यासजी बोले – इस प्रकार उन नारायण का भी वह वचन सुनकर मुनिश्रेष्ठ नारद हाथ जोड़कर स्तुति वचनों से शिव तथा विष्णु का स्तवन करने लगे ।।39।।
नारदजी बोले – विश्वेश्वर ! देवदेव ! प्रसन होइए. नारायण ! वासुदेव ! प्रसन्न होइए. अपने शुभ्र शरीर के अंगों में सर्वरूपी आभूषण धारण करने वाले शिव ! प्रसन्न होइए. कौस्तुभमणि से विभूषित शरीर वाले नारायण ! मुझ पर प्रसन होइए।।40।। शरण देने वाले गंगाधर ! मुझ पर प्रसन्न होइए. सुदर्शन चक्र को धारण करने वाले पूजनीय विष्णो ! मुझ पर प्रसन्न होइए. दिगम्बररूप विश्वेश्वर ! मुझ पर प्रसन्न होइए. गदा धारण करने वाले विश्वेश्वर ! मुझ पर प्रसन्न होइए।।41।।
त्रिपुर का वध करने वाले शिव को नमस्कार है. असुर कंस का वध करने वाले (कृष्णरूप) विष्णु को नमस्कार है. अन्धकासुर का विनाश करने वाले शिव को नमस्कार है और तृणावर्त का संहार करने वाले विष्णु को नमस्कार है. विष्णु को बार-बार नमस्कार है. गरुड आसन पर विराजमान आप विष्णु को तथा नन्दी पर आरुढ़ आप शिव को नमस्कार है।।42-43।।
व्यासजी बोले – परमपूज्य उन देवर्षि नारद को इस प्रकार स्तुति करते हुए देखकर महादेव जी की ओर दृष्टि करके भगवान विष्णु ने कहा ।।44।।
विष्णु जी बोले – देव ! ये ब्रह्मापुत्र देवर्षि नारद परम भक्त, ज्ञानी एवं विनम्र स्वभाव वाले हैं. आप भक्तवत्सल हैं, इसलिए आपको इन पर अवश्य ही कृपा करनी चाहिए।।45।।
व्यासजी बोले – भगवान शिव ने भी भगवान विष्णु द्वारा कही हुई बात को सुनकर कहा – आप शरणागतों पर कृपा करने वाले हैं और आपने मेरे लिए अत्यन्त कल्याणकारी बात कही है।।46।। तत्पश्चात महान ज्ञानी और बुद्धिमान नारद ने कृपासिन्धु देवाधिदेव महादेव से पुन: पूछा।।47।।
नारदजी बोले – इन्द्र आदि समस्त लोकपालों ने आप (शिव), विष्णु तथा जगत्पति ब्रह्मा की उपासना करके श्रेष्ठ पद प्राप्त किया है. देवेश ! यदि मेरे ऊपर आपका अनुग्रह हो तो आप लोग जिस पूर्ण तथा अविनाशी देवता की आराधना करते हैं, उसके विषय में मुझे बताइए. देव ! जिसकी कृपा से आपने ऎसा महान ऎश्वर्य प्राप्त किया है, उस देवता के विषय में यदि आप मुझे बताते हैं तो मेरे ऊपर यह आपका अनुग्रह होगा।।48-50।। व्यासजी बोले – योगीश्वर मुनिवर नारदजी द्वारा इस प्रकार प्रार्थना करने पर निर्मलपति भगवान शंकर पहले तो सतत समाधिस्थ हो गये. पुन: भगवती श्रीदुर्गा के चरण कमल का अपने हृदय में ध्यान करते हुए और उन्हें ही एकमात्र पूर्णब्रह्म जानकर उन्होंने आदरपूर्वक कहना प्रारम्भ किया।।51।।
।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीव्यास-जैमिनि-संवाद में “व्रतोपासनावर्णन” नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ।।

महाभागवत – देवीपुराण – तीसरा अध्याय
तीसरे अध्याय में देवी माहात्म्य का वर्णन है, देवी द्वारा त्रिदेवों को सृष्ट्यादि के कार्यों में नियुक्त करना, आदिशक्ति का गंगा आदि पाँच रूपों में विभक्त होना, ब्रह्माजी के शरीर से मनु तथा शतरूपा का प्रादुर्भाव, दक्ष की कन्याओं से सृष्टि का विस्तार, आदिशक्ति द्वारा भगवान शंकर को भार्यारूप में प्राप्त होने का वर प्रदान करना, है.
श्रीमहादेव जी बोले – जो शुद्ध, शाश्वत और मूलप्रकृतिस्वरुपिणी जगदम्बा हैं, वे ही साक्षात परब्रह्म हैं और वे ही हमारी देवता भी हैं।।1।। जिस प्रकार ये ब्रह्मा, ये विष्णु और स्वयं मैं शिव इस जगत की उत्पत्ति, पालन और संहार के कार्य में नियुक्त हैं, उसी प्रकार अनेक ब्रह्माण्डों में निवास करने वाले करोड़ों प्राणियों के सृजन, पालन और संहार का विधान करने वाली वे महेश्वरी ही हैं।।2-3।। निराकार रहते हुए वे महादेवी अपनी लीला से देह धारण करती हैं. उन्हीं के द्वारा इस विश्व का सृजन किया जाता है, पालन किया जाता है और अन्त में उन्हीं के द्वारा संहार किया जाता है. उनके द्वारा ही यह जगत मोहग्रस्त होता है. प्राचीनकाल में वे पूर्णा भगवती ही अपनी लीला से दक्ष की कन्या के रूप में, हिमवान की पुत्री के रूप में तथा अपने अंश से विष्णु भार्या लक्ष्मी के रूप में एवं ब्रह्मा की भार्या सावित्री तथा सरस्वती के रूप में प्रकट हुई।।4-6।।
नारदजी बोले – देवेश ! यदि आप मुझ पर पसन्न हैं और मेरे प्रति आपकी उत्तम प्रीति है, तब नाथ ! महामते ! मुझे विस्तारपूर्वक वह सब प्रसंग बताइए, जिस प्रकार वे प्रकृतिरूपा पूर्णा भगवती प्राचीन काल में दक्षकन्या के रूप में अवतरित हुई और जिस प्रकार भगवान शिव ने उन ब्रह्मस्वरुपिणी को पत्नी के रूप में प्राप्त किया, जिस प्रकार वे हिमालय के घर में पुन: पुत्री होकर उत्पन्न हुईं और फिर त्रिनेत्र महादेव ने उन्हें पत्नी के रूप में प्राप्त किया और जिस प्रकार उन्होंने छ: मुखों वाले कार्तिकेय तथा गजानन गणेश – इन दो महान बलशाली और पराक्रमी पुत्रों को जन्म दिया ।।7-10।।
श्रीमहादेवजी बोले – पहले यह जगत सूर्य, चन्द्रमा, तारों, दिन-रात, अग्नि, दिशा, शब्द, स्पर्श आदि से तथा अन्य किसी प्रकार के तेज से रहित था. उस समय श्रुति के द्वारा एकमात्र जिनका प्रतिपादन किया जाता है, ब्रह्मस्वरूपिणी वे भगवती विद्यमान थीं. सच्चिदानन्द विग्रह वाली वे प्रकृतिरूपा भगवती शुद्ध ज्ञान से युक्त, नित्य, वाणी से परे, निरवयव, योगियों के द्वारा कठिनता से प्राप्त होने वाली, सर्वत्र व्याप्त रहने वाली, उपद्रवों से रहित, नित्यानन्दस्वरूपिणी तथा सूक्ष्म और गुरुत्व आदि गुणों से परे हैं।।11-14।।
उन भगवती की सृष्टि करने की इच्छा हुई. उसी समय रूपरहित होते हुए भी प्रकृतिस्वरूपिणी उन पराम्बा ने अपनी इच्छा से शीघ्र ही प्रसन्नतापूर्वक रूप धारण कर लिया. उनका विग्रह निखरे हुए काजल के समान था, विकसित कमल के समान सुन्दर मुख था, चार भुजाएँ थीं, नेत्र लाल वर्ण के थे, बाल खुले हुए थे और दिशारूपी वस्त्र से सुशोभित, स्थूल तथा उन्नत स्तनधारिणी ज्योतिर्मयी वे सिंह की पीठ पर विराजमान थीं।।15-16½ तदनन्तर उन्होंने अपनी इच्छा से अपने रजस, सत्त्व और तमोगुण के द्वारा शीघ्र ही चैतन्यरहित एक पुरुष की सृष्टि की. सत्त्व आदि तीनों गुणों से युक्त उस उत्पन्न पुरुष को देखकर भगवती ने स्वेच्छा से उस पुरुष में सृष्टि करने की अपनी इच्छा का समावेश किया. यह देखकर वह शक्तिमान पुत्र तीनों गुणों के आश्रय से ब्रह्मा, विष्णु और शिव नाम वाले तीन पुरुषों के रूप में प्रकट हो गया।।16-19½
इस पर भी सृष्टि नहीं हो रही है – ऎसा देखकर उन भगवती ने उस पुरुष को जीवात्मा और परमात्मा – इन दो रुपों में विभक्त कर दिया. इसके बाद वे प्रकृति अपनी इच्छा से स्वयं अपने को भी तीन भागों में विभक्त कर माया, विद्या और परमा – इन तीन रुपों में प्रकट हो गईं।।20-21½ प्राणियों को विमोहित करने वाली जो शक्ति है, वही माया है और संसार को संचालित करने वाली तथा प्राणियों में स्पंदन आदि का संचार करने वाली जो शक्ति है, वही परमा कही गई हैं. वही तत्त्वज्ञानमयी तथा संसार से मुक्ति दिलाने वाली भी हैं. माया के वशीभूत जीव जब उस परमा शक्ति की उपेक्षा करने लग गया, तब मुने ! मोहात्मिका उस माया का आश्रय ग्रहण करने वाले वे पुरुष भी विषयों के प्रति आसक्त होने लगे. मुनिश्रेष्ठ ! उस समय वे उस माया के प्रभाव से अत्यन्त प्रमत्त हो गये. तीसरी जो परा विद्या है, वह स्वयं गंगा, दुर्गा, सावित्री, लक्ष्मी और सरस्वती – इन पाँचों रूपों में विभक्त हो गई।।22-25½
उन साक्षात् जगत्पालिनी पूर्णा प्रकृति ने सृष्टिकार्य में ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव को अलग-अलग नियुक्त करके कहा – मैंने सृष्टि के निमित्त ही आप लोगों को अपनी इच्छा से उत्पन्न किया है. अतएव महाभाग ! आप लोग वैसा ही कीजिए, जैसी मेरी इच्छा है।।26-27½ ब्रह्मा अनेक प्रकार के विचित्र तथा असंख्य स्थवर और जंगम प्राणियों की निर्बन्धभाव से उत्पत्ति करें. विशाल भुजाओं वाले और बलशालियों में श्रेष्ठ विष्णु जगत को क्षुब्ध करने वाले दुष्टों का संहार करते हुए सृष्टि का पालन करें और अन्त में जब मेरी नाश करने की इच्छा होगी, तब तमोगुणयुक्त शिव सम्पूर्ण जगत का नाश करेंगे. आप तीनों पुरुषों को सृष्टि आदि तीनों कार्यों में एक-दूसरे की सहायता भी अवश्य करनी चाहिए।।28-31½
मैं सावित्री आदि पाँच श्रेष्ठ देवियों के रूपों में विभक्त होकर आप लोगों की पत्नियाँ बनकर स्वेच्छापूर्वक विहार करूँगी और सभी प्राणियों में नारी रूप धारण कर शम्भु के सहयोग द्वारा स्वेच्छा से सभी प्राणियों को जन्म दूँगी. ब्रह्मन् ! अब आप मेरी आज्ञा से मानुषी सृष्टि कीजिए, नहीं तो इस सृष्टि का विस्तार नहीं हो पाएगा।।32-34½।।
ब्रह्मा आदि से ऎसा कहकर वे प्रकृतिस्वरूपिणी परात्पर महाविद्या उनके देखते-देखते अन्तर्धान हो गईं और उनका यह वचन सुनकर ब्रह्माजी ने सृष्टि कार्य आरम्भ कर दिया।।35-36।।
इधर भगवान महेश्वर उन पूर्ण प्रकृति को पत्नीरूप में प्राप्त करने के लिए संयतचित्त होकर भक्तिपूर्वक तप के द्वारा आराधना करने लगे।।37।। अपने ज्ञाननेत्र से महेश्वर को ऎसा करते देखकर वे परम पुरुष विष्णु भी उन्हीं को प्राप्त करने के निमित्त तपस्या करने के लिए बैठ गए।।38।।
यह सब जानकर भगवान ब्रह्मा भी सृष्टि करना छोड़कर उसी अभिलाषा के साथ तपस्याहेतु निश्चल होकर बैठ गए।।39।। इस प्रकार आराधनारत उन तीनों के तप की परीक्षा करने के लिए स्वयं प्रकृति ब्रह्माण्ड को क्षुब्ध करने वाला भयंकर रूप धारण कर उनके पास आयीं. उन्हें देखकर ब्रह्माजी भयाक्रान्त हो गए और उन्होंने अपना मुख फेर लिया. वे उनके सम्मुख पुन : गईं, तब भी ब्रह्माजी व्मुख हो गए. इस प्रकार वे चारों दिशाओं में क्रम से चार बार गईं. इससे अत्यन्त डरे हुए वे ब्रह्मा जी चार मुख वाले हो गए और भय से संत्रस्त होकर वे तपस्या छोड़कर उसी समय वहाँ से भाग गए।।40-43।।
इसके बाद महान भय उत्पन्न करने वाली वे प्रकृति वहाँ पर शीघ्र पहुँची, जहाँ परम पुरुष विष्णु एकाग्रचित्त होकर तप कर रहे थे. उन्हें देखकर हजार सिर, हजार नेत्र तथा हजार पैरों वाले वे विष्णु भी उस समय भयभीत हो गए और तपस्या छोड़कर आँखें बंद किए हुए जल के अंदर प्रविष्ट हो गए. इस प्रकार उन दोनों की तपस्या भंग हो जाने पर भीषण रूपवाली वे प्रकृति महेश के पास गईं, किंतु वे किसी भी तरह उनका ध्यान भंग करने में समर्थ नहीं हो सकीं।।44-47।।
अपने विज्ञान विशेष से भगवान शिव भयंकर रूपवाली देवी प्रकृति को परीक्षा के लिए आयी हुई जानकर समाधि में ही बैठे रहे।।48।। उससे अत्यन्त प्रसन्न हुई प्रकृति-स्वरूपिणी श्रेष्ठ भगवती जो गंगास्वरूप से स्वर्ग में स्थित हैं, भगवान शिव को देवी पूर्णा के स्वरूप में प्राप्त हुईं. उन्होंने अपनी पूर्वप्रतिज्ञा के अनुसार अपने अंश से सावित्री होकर पतिरूप में ब्रह्माजी को प्राप्त किया. महामते ! इसी प्रकार उन्होंने अपने ही अंश से लक्ष्मी होकर विष्णु को पतिरूप में प्राप्त किया और अपने ही अंश से सरस्वती के भी रूप में वे भगवती प्रतिष्ठित हुईं।।49-50½।।
इसके बाद महामते ! समाधि भंग हो जाने के अनन्तर उन लोकपितामह ब्रह्मा ने पृथ्वी आदि महाभूतों तथा अन्य तत्त्वों की उत्पत्ति करके मरीचि, अत्रि, पुलह, क्रतु, अंगिरा, प्रचेता, वसिष्ठ, नारद, भृगु और पुलस्त्य – इन दस मानस पुत्रों का सृजन किया. महामते ! ये सभी दस पुत्र समान गुण-प्रभाव वाले थे. इसके बाद उन्होंने दक्ष आदि प्रमुख प्रजापतियों तथा मनुष्यों की उत्पत्ति की।।51-54।। तदनन्तर उन्होंने मानसी पुत्री सन्ध्या और मनोभव कामदेव को उत्पन्न किया तथा पुन: स्वर्ग, मृत्युलोक एवं पाताललोक में स्त्री-पुरुषों को विमोहित करने के लिए कामरूप उस पुरुष को स्वयं नियुक्त कर दिया. प्रजापति ब्रह्मा ने सभी प्राणियों में विमोह उत्पन्न करने के उद्देश्य से उन्हें पुष्पमय धनुष तथा पुष्पमय पाँच बाण प्रदान किए।।55-56½
तत्पश्चात ब्रमाजी ने अपने उत्तम शरीर को दो भागों में विभक्त किया. उनके शरीर के बायें आधे भाग से शतरूपा नामक सुन्दर रूपवाली स्त्री उत्पन्न हुई और दाएँ आधे भाग से स्वायम्भुव नाम वाले मनु उत्पन्न हुए. उन्होंने कामदेव के पाँच पुष्प बाणों से आहत मनोहर मुसकानयुक्त उस सुन्दर अंगोंवाली शतरूपा को भार्या के रूप में ग्रहण किया।।57-59।। मुने ! तत्पश्चात उन स्वायम्भुव मनु ने उस शतरूपा से तीन कन्याएँ तथा दो पुत्र उत्पन्न किए. देवर्षिवर ! वे आकूति, देवहूति और प्रसूति नाम की कन्याएँ थीं तथा प्रियव्रत और उत्तानपाद नाम के पुत्र थे।।60-61।।
उन्होंने आकूति नामक अपनी पुत्री रुचि प्रजापति को, मध्यमा पुत्री देवहूति ऋषि कर्दम को तथा सुन्दर स्वरूपवाली तीसरी पुत्री प्रसूति दक्षप्रजापति को समर्पित कर दी।।62।। कर्दम ने देवहूति से अरुन्धती आदि नौ पुत्रियाँ कीं. वे पुत्रियाँ वसिष्ठ आदि ऋषियों की भार्याएँ हुईं।।63।। प्रजापति दक्ष की भी चौदह कन्याएँ हुईं. अदिति, दिति, दनु, काष्ठा, अरिष्टा, सुरसा, तिमि, मनु, क्रोधवशा, ताम्रा, विनता, कद्रु, स्वाहा और भानुमती – ये उन कन्याओं के नाम कहे गए हैं।।64-65।। उन्होंने उनमें से स्वाहा नाम की कन्या अग्नि को और शेष तेरह कन्याएँ ऋषि कश्यप को प्रदान कर दीं. कश्यप ने स्वयं उन पत्नियों से नानाविध प्रजाएँ उत्पन्न कीं, तब उन प्रजाओं से सम्पूर्ण जगत व्याप्त हो गया. इस प्रकार भगवान ब्रह्मा ने इस सारे संसार की सृष्टि की।।66-67।।
तदनन्तर देवी प्रकृति ने उन ब्रह्मा से कहा – महामते ! द्विजगण तीनों संध्याओं में जिनकी उपासना करते हैं, वे सावित्री मेरे अंश से उत्पन्न हुई हैं. वे सरस्वती तथा लक्ष्मी भी मेरे ही अंश से उत्पन्न हुई हैं, जिन्होंने अपनी लीला से तीनों लोकों के पालनकर्त्ता विष्णु को पतिरूप में प्राप्त किया. आप दोनों ब्रह्मा तथा विष्णु विषयासक्त हो गए।।68-69।। देवर्षिवर ! उन साक्षात पराप्रकृति को पूर्णभाव से पत्नीरूप में पाने की अभिलाषा करते हुए भी शिव परम योगी बने रहे. उस प्रकार की तपस्या में रत उन भगवान शिव से पराप्रकृति जगदम्बिका ने प्रसन्न होकर प्रत्यक्ष रूप से कहा।।70-71।।
प्रकृति बोलीं – शम्भो ! आपका कौन-सा अभीष्ट वर है? मुझसे वह माँग लें. आपकी तपस्यापूर्ण उपासना से परम प्रसन्नता को प्राप्त मैं वह वर आपको अवश्य दूँगी।।72।।
शिवजी बोले – जिनसे पूर्व में पाँच श्रेष्ठ नारियाँ प्रकट हुई थीं, वे आप विशुद्ध प्रकृति ही हम ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश्वर को प्राप्त होगीं. उनमें से अपने अंश से सावित्री के रूप में उत्पन्न होकर आप ब्रह्माजी को प्राप्त हुईं और अपने ही अंश से लक्ष्मी एवं सरस्वती होकर विष्णु को प्राप्त हुई हैं, किंतु परमा पूर्णा प्रकृति आप स्वयं अपनी लीला से कहीं जन्म लेकर मुझे प्राप्त हों।।73-75।।
प्रकृति बोली- दक्षप्रजापति के यहाँ अपनी माया से उत्पन्न होकर मनोहर शरीर वाली पूर्णा प्रकृति मैं ही आपकी भार्या बनूँगी।।76।। जब दक्ष के यहाँ उनके देहाभिमान से मेरा तथा आपका अनादर होगा, तब अपने मायारूपी अंश से उन्हें विमोहित कर मैं अपने स्थान को चली जाऊँगी. महेश्वर ! उस समय आपसे मेरा वियोग हो जाएगा और तब आप भी मेरे बिना कहीं भी नहीं ठहर सकेंगे. इस प्रकार हम दोनों के बीच परम प्रीति बनी रहेगी।।77-79।।
श्रीमहादेवजी बोले – मुनिश्रेष्ठ ! वे परमेश्वरी प्रकृति महेश्वर से ऎसा कहकर अन्तर्धान हो गईं और शिव के मन में प्रसन्नता व्याप्त हो गई।।80।।
।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीशिव-नारद-संवाद में “महेश्वरदानवर्णन” नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ।।3।।

महाभागवत – देवी पुराण – चौथा अध्याय
इस अध्याय में दक्ष प्रजापति की तपस्या से प्रसन्न भगवती शिवा का “सती” नाम से उनकी पुत्री के रूप में जन्म लेना, भगवती सती एवं भगवान शिव की परस्पर प्रीति का वर्णन है.
श्रीमहादेवजी बोले – एक बार की बात है जगत की सृष्टि करने वाले ब्रह्मा ने दक्ष प्रजापति को हर्षित करते हुए उनसे कहा – पुत्र ! मैं तुम्हारे कल्याण की एक बात बता रहा हूँ, तुम उसे सुनो।।1।। साक्षात भगवान शिव ने परमा पूर्णा प्रकृति की आराधना की तथा उन्हें भार्या बनाने के विचार से उनसे प्रार्थना की, इस पर उन प्रकृति ने वह बात स्वीकार कर ली. अत: वे महेश्वरी कहीं-न-कहीं जन्म लेकर उन शिव को पति के रूप में अवश्य प्राप्त करेंगी, इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है।।2-3।। वे प्रकृति जिस प्रकार आपकी पुत्री के रूप में उत्पन्न होकर शम्भु की भार्या होवें, इसके लिए आप अति कठोर तपस्या के द्वारा भक्तिपूर्वक उनकी प्रार्थना कीजिए. वे इस लोक में भाग्य से जिसकी पुत्री के रूप में उत्पन्न होंगी, उसका जीवन सफल हो जाएगा और उसके पितृगण भी धन्य हो जाएँगे. अत: इस जगत में उत्पन्न मायारूपिणी लोकवन्द्या उन जगदम्बिका को पुत्री रूप में प्राप्त कर आप अपना जन्म सार्थक कीजिए।।4-6।।
दक्ष बोले – पिताजी ! मैं आपकी आज्ञा से निश्चित रूप से वैसा ही प्रयत्न करूँगा, जिससे वे साक्षात प्रकृतिरूपा जगदम्बा मेरी पुत्री के रूप में जन्म लें।।7।
श्रीमहादेव जी बोले – ब्रह्माजी से ऎसा कहकर दक्ष प्रजापति अति शीघ्रता से क्षीर सागर के तट पर आकर जगदम्बा की आराधना करने लगे. मुनिवर ! उन्होंने उपवास इत्यादि तपश्चरण से भगवती की आराधना करते हुए तीन हजार दिव्य वर्ष बिताए।।8-9।।उस प्रकार की तपस्या में रत दक्ष के सम्मुख भगवती शिवा प्रकट हुईं. उनका विग्रह निखरे हुए काजल के समान था तथा वे चार सुन्दर विशाल भुजाओं से युक्त थीं. वे अपने हाथों में खड्ग, कमल तथा अभय मुद्रा धारण किए हुए थीं, उनके नेत्र नीलकमल के दल की भाँति सुशोभित थे, उनके दाँत अत्यन्त मनोहर थे, वे सुन्दर मुण्डमाला से विभूषित थीं. वे दिशारूपी वस्त्र धारण किए हुए थीं, उनके बाल खुले हुए थे, वे अनेकविध मणियों से शोभा पा रही थीं, सिंह की पीठ पर सवार थीं और मध्याह्नकालीन सैकड़ों सूर्य की प्रभा के समान प्रकाशमान थीं।।10-12।। उन्होंने दक्ष से कहा – वत्स ! तुम मुझसे क्या याचना कर रहे हो? प्रजापते ! तुम्हारे भाव से प्रसन्न होकर मैं उसे तुम्हें शीघ्र दूँगी।।13।।
दक्ष बोले – माता ! यदि आप मुझ निष्पाप दास पर प्रसन्न हैं तो आप मेरी पुत्री के रूप में मेरे घर में जन्म लीजिए।।14।।
श्रीदेवी जी बोलीं – मुझे पत्नी के रूप में प्राप्त करने की कामना से शम्भु ने पूर्वकाल में मुझसे प्रार्थना की थी. वह प्रार्थना मैंने पूर्व में स्वीकार कर ली थी. अब मुझे कहीं जन्म लेना है।।15।। अब मैं आपके घर में जन्म लेकर शम्भु की भार्या बनूँगी. मैं साक्षात प्रकृतिस्वरूपिणी भगवती पूर्णा आपकी इस तपस्या से प्रसन्न हूँ. स्वर्णतुल्य गौर अंगों से युक्त विग्रहवाली मैं आपकी कन्या होऊँगी. सुन्दर शरीर वाली तथा सौम्य रूपवाली मैं तभी तक आपके यहाँ रहूँगी, जब तक आपकी तपस्या का पुण्य क्षीण नहीं हो जाता. पुन: तपस्या का पुण्य़ क्षीण होने पर जब आपके द्वारा मेरा अनादर होगा, तब मैं इसी तरह का विग्रह धारण कर अपनी माया से स्थावर-जंगममय सम्पूर्ण जगत को विमोहित करके अपने धाम चली जाऊँगी।।16-19½।।
श्री महादेव जी बोले – मुनिश्रेष्ठ ! तीनों लोकों की जननी तथा उत्तम गुणों वाली प्रकृति देवी दक्ष से ऐसा कहकर उनके देखते-देखते अचानक अंतर्धान हो गयीं और इसके बाद प्रजापति दक्ष ने भी अपने घर जाकर ब्रह्मा जी से उस वरदान के विषय में बताया, जिसे जगद्धात्री भगवती ने प्रसन्न होकर उन्हें दिया था ।।20-21½।।
तत्पश्चात उन आद्या सनातनी पूर्णा प्रकृति ने जन्म लेने के लिए सर्वगुण सम्पन्ना दक्ष पत्नी के गर्भ में प्रवेश किया। तदनन्तर दक्षपत्नी प्रसूति ने शुभ दिन में एक कन्या को जन्म दिया। वह कन्या प्रकृतिस्वरूपिणी भगवती पूर्णा ही थीं, उस कन्या के अंग गौर वर्ण के थे, करोड़ों चन्द्रमा के समान उसकी आभा थी, खिले हुए कमल के समान उसके बड़े-बड़े नेत्र थे, वह आठ भुजलताओं से सुशोभित थी और उसका मुख अतीव सुन्दर था। उस समय आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी, सैकड़ों दुन्दुभियाँ बज उठीं और दिशाएं अत्यंत स्वच्छ हो गयीं।।22-25½।। तब पुत्री का जन्म सुनकर दक्ष प्रजापति वहाँ आ गए और उस कन्या को देखकर अत्यंत प्रसन्न मन वाले उन दक्ष ने बन्धु-बांधवों के साथ महान उत्सव आयोजित किया तथा दसवें दिन उस कन्या का “सती” ऐसा कहकर नामकरण किया।।26-27।।
वह कन्या वर्षाकालीन मन्दाकिनी की भाँति प्रतिदिन बढ़ने लगी और शरत्कालीन चंद्रज्योत्स्ना के समान दिव्य कान्ति से सुशोभित होने लगी।।28।। प्रजापति दक्ष एक बार सुन्दर मुखवाली उस कन्या को विवाह योग्य देखकर अपने मन में उसके विवाह के लिए विचार करने लगे।।29।। यह कन्या किसे प्रदान करनी चाहिए अथवा ये तो स्वयं पराप्रकृति हैं, जो अपने वर हेतु पहले से ही वचनबद्ध हैं. इसलिए वह बात मेरे पूरी तरह बहुत प्रयत्न करने पर भी किसी प्रकार अन्यथा नहीं हो सकती. जिन शिव के अंश से उत्पन्न रुद्रगण मेरी आज्ञा का अनुगमन करते हैं, उनको बुलाकर यह रूपवती कन्या देने योग्य नहीं है. इसलिए शूलधारी शिव को बिना आमन्त्रित किए श्रेष्ठ देव, दैत्य, गन्धर्व और किन्नरोँ की एक शिवशून्य सभा बुलाकर मुझे स्वयं वरोत्सव – यज्ञ का आयोजन करना चाहिए. तब वही होगा, जो विधि का विधान होगा।।30-34।।
तब अपने मन में भली-भाँति ऎसा निश्चय करके मनस्वी दक्षप्रजापति ने सभी देवताओं तथा असुरों को बुलाकर बिना शिव के ही सभा का आयोजन कर दिया. सती के उस अद्भुत तथा मनोहर स्वयंवर में देवताओं और दैत्यों तथा मुनीन्द्रों की कान्ति से वह सभा भी अत्यन्त सुशोभित हो रही थी. वह सभा सूर्य के सदृश तेजमयी और चन्द्रमा के समान कान्तिमती होकर सुशोभित हो रही थी।।35-36½।।
मुनिवर ! दिव्य माला और वस्त्र तथा प्रभामय स्वर्ण के मुकुट धारण किए हुए श्रेष्ठ देवगण उस सभा में विराजमान थे. मणियों तथा स्वर्ण सजाए गए उनके रथों, घोड़ों और हाथियों एवं विभिन्न वर्णों के ध्वजों, छत्रों तथा पताकाओं – इन सभी से सुसज्जित वह दक्षपुरी कान्तियुक्त होकर शोभा पा रही थी।।37-39।। सैकड़ों-हजारों नगाड़े, मृदंग और ढोल बजने लगे. उस ध्वनि से सारा आकाश गूँज उठा. उस सभा में गन्धर्वगण मनोहर गीत गा रहे थे और सैकड़ों-हजारों श्रेष्ठ अप्सराएँ आनन्दित होकर नाच रही थीं।।40-41।। इसके बाद प्रजापति दक्ष ने शुभ समय आने पर त्रैलोक्य सुन्दरी उस कन्या सती को सभा में बुलाया. मुनिश्रेष्ठ ! मनोहर तथा कान्तियुक्त वह सती परम प्रसन्नतापूर्वक वहाँ उपस्थित हुई. वह सौन्दर्य की प्रतिमा के समान सुशोभित हो रही थी।।42-43।।
इसी बीच सर्वश्रेष्ठ महेश्वर नन्दी पर सवार होकर वहाँ आ गए और अन्तरिक्ष में स्थित हो गए. तदनन्तर शिवविहीन उस सभा को देखकर प्रजापति दक्ष ने अपनी परम सुन्दरी कन्या सती से यह कहा – ।।44-45।। माता ! ये देवता, असुर, ऋषि तथा महात्मा लोग यहाँ उपस्थित हैं. इनमें से जो भी आपको अच्छा प्रतीत होता हो, उस गुणवान तथा सुन्दर रूपवाले को माला पहनाकर आप उसका वरण कर लें. ऎसा कहने पर प्रकृतिरूपिणी देवी सती ने “शिवाय नम:” – ऎसा कहकर वह माला भूमि को समर्पित कर दी और वहाँ पर प्रकट होकर भगवान शिव ने सती के द्वारा अर्पित की गई उस माला को अपने सिर में धारण कर लिया. रत्नों से विभूषित समस्त अंगों वाले, करोड़ों चन्द्रमाओं के समान प्रभा वाले, दिव्य माला तथा वस्त्र धारण करने वाले, दिव्य गन्धों से लिप्त शरीर वाले, खिले हुए कमल के समान तीन सुन्दर नेत्र वाले, दिव्यरूपधारी भगवान सदाशिव सती के द्वारा प्रदत्त उस माला को धारण कर प्रसन्नतापूर्वक सभी देवताओं के देखते-देखते उस स्थान से सहसा अन्तर्धान हो गए।।46-51।।
मुनिश्रेष्ठ ! सती ने महेश्वर को माला अर्पित कर दी थी, उस कारण से दक्षप्रजापति का उस सती के प्रति आदरभाव कुछ कम हो गया।।52।। इसके बाद मरीचि आदि अपने मानस पुत्रों तथा अन्य मुनीश्वरों के साथ वहाँ विराजमान ब्रह्माजी ने सभी प्रजाओं के स्वामी दक्ष से यह बात कही – “आपकी इस कन्या ने देवाधिदेव शिव का वरण किया है, इसलिए उन श्रेष्ठ महेश्वर को बुलाकर प्रयत्नपूर्वक वैवाहिक विधि-विधान से अपनी पुत्री उन्हें दे दीजिए”।।53-54।। उनका यह वचन सुनकर और प्रकृतिदेवी द्वारा कही गई पूर्व बात को याद करके दक्ष ने महेश्वर को बुलाकर उन्हें सती को सौंप दिया. महेश ने भी वैवाहिक-विधान के साथ उनका प्रसन्नतापूर्वक पाणिग्रहण कर लिया।।55½।।
इसके अनन्तर ब्रह्मा, विष्णु और नारद आदि ऋषिगण वेद-वाक्यों के द्वारा उन स्तुति-प्रिय शिव तथा शिवा को स्तुति से प्रसन्न करने लगे. सभी देवतागण उनके ऊपर पुष्पों की वर्षा करने लगे. सैकड़ों-हजारों दुन्दुभियाँ भी बजने लगीं और सभी देवता, गन्धर्व तथा किन्नर अत्यन्त प्रसन्न हो गए।।56-58।। जटा तथा भस्म धारण किए हुए विश्वेश्वर शिव को देखकर दक्षप्रजापति के चित्त में बड़ी व्याकुलता छायी हुई थी और वे मन ही मन सती को भी कोस रहे थे।।59।। तत्पश्चात सभी लोकों में एकमात्र सुन्दरी सती को साथ में लेकर महेश्वर हिमालय के अत्यन्त सुन्दर शिखर (कैलास) के लिए प्रस्थान कर गए।।60।। मुनिश्रेष्ठ ! महादेव के साथ सती के चले जाने पर दक्षप्रजापति का दिव्य ज्ञान विलुप्त हो गया।।61।।
।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीशिव-नारद-संवाद में “सती विवाह वर्णन” नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ।।

महाभागवत – देवी पुराण – पाँचवाँ अध्याय
इस अध्याय में दक्षप्रजापति की शिव के प्रति द्वेषबुद्धि, महर्षि दधीचि द्वारा दक्ष को समझाना तथा भगवान शिव के माहात्म्य को बताना आदि बातें हैं.
श्रीमहादेव जी बोले – तदनन्तर भगवान शंकर और सती की भर्त्सना करते हुए क्षीण पुण्यवाले दक्षप्रजापति दु:ख से व्याकुल होकर रोने लगे।।1।। मुनिश्रेष्ठ ! दु:ख से संतप्तहृदय वाले उन दक्ष को देखकर शिवजी की भक्ति में तत्पर रहने वाले परम ज्ञानी मुनि दधीचि ने उनसे यह वचन कहा – ।।2।।
दधीचि बोले – मोह के कारण परम शिव तथा सती के सत्त्व को न जानकर आप क्यों रो रहे हैं? आपके महान भाग्य से ही ये सती आपके घर में पुत्री रूप में उत्पन्न हुई हैं. ये सती साक्षात निराकार आदि प्रकृति ही हैं और शिव साक्षात परम पुरुष हैं, इसमें आप लेशमात्र भी संदेह न करें।।3-4।। प्रजापति ! ब्रह्मा, इन्द्र आदि देवताओं तथा बड़े-बड़े असुरों के द्वारा कठोर तप करने पर भी जो भगवती उन्हें कभी दर्शन नहीं देती हैं, उन्हें आपने पुत्री रूप में प्राप्त किया है. मोह में पड़कर उन सती को बिना जाने आप उनकी निन्दा क्यों कर रहे हैं? निश्चित रूप से उन्हीं महामोहस्वरूपिणी भगवती ने आपको ठगा है।।5-6।। दक्ष बोले – वे शम्भु यदि जगत के ईश्वर, अनादि और परम पुरुष हैं तो भयंकर रूप तथा तीन नेत्रों वाले उन्हें प्रेतपति (श्मशान) क्यों प्रिय है? और मुने ! वे भिक्षुकरूप में अपने शरीर में भस्म क्यों पोते रहते हैं?।।7½।।
दधीचि बोले – वे शम्भु पूर्ण, नित्यानन्दस्वरुप तथा सभी ईश्वरों के भी ईश्वर हैं. जो लोग उनकी शरण ग्रहण करते हैं, वे कभी भी दु:ख प्राप्त नहीं करते. वे भगवान शम्भु भिक्षुक हैं – ऎसी दुर्बुद्धि आपकी क्यों हो गई है?।।8-9।। ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवता और तत्त्वदर्शी योगिजन भी जिनके परम स्वरूप को देख पाने में समर्थ नहीं होते हैं, आप उन विरूपाक्ष शम्भु की निन्दा क्यों कर रहे हैं? सर्वत्र विचरणशील वे भगवान सदाशिव सभी जगह विराजमान हैं. वे श्मशान में रहें अथवा सुरम्य पुरी में रहें, उन्हें इसमें कोई विशेषता नहीं दिखाई पड़ती है।।10-11½।।
शिवलोक बड़ा ही अपूर्व है. वह ब्रह्मा, विष्णु आदि के लिए भी दुर्लभ है. वैकुण्ठ, ब्रह्मलोक तथा स्वर्ग उस शिवलोक की एक कला के भी तुल्य नहीं हैं. कैलासपुरी देवताओं के लिए भी अत्यन्त दुर्लभ है. अनेक देवताओं से सुशोभित तथा कल्पवृक्षों से युक्त नन्दनवन से घिरी हुई स्वर्ग के अधिपति इन्द्र की पुरी अमरावती भी उस शिवलोक की सोलहवीं कला के भी बराबर नहीं है।।12-14।। मृत्युलोक में भी वाराणसी नगरी नामक उनकी एक परम रमणीय पुरी है, जो मुक्ति प्रदान करने के कारण “मुक्तिक्षेत्र” कहलाती है. जहाँ ब्रह्मा आदि प्रधान देवता भी मृत्यु की अभिलाषा रखते हैं तो फिर मानव आदि प्राणियों की बात ही क्या? वह परमात्मा शिव की ऎसी दिव्य पुरी है. यह विचार आपकी दुर्बुद्धि का सूचक है कि बिना श्मशान के अन्यत्र कहीं भी उनका ठिकाना नहीं है।।15-।।16 ½।। ऎसे सत्य-स्वरुप त्रिलोकेश्वर देवाधिदेव भगवान सदाशिव और साक्षात ब्रह्मस्वरूपिणी महेश्वरी सती की भी निन्दा आपको अज्ञानवश कभी नहीं करनी चाहिए. वे आपके बड़े भाग्य से ही आपके घर पुत्रीरूप में प्रादुर्भूत हुई हैं।।17-18½।।
श्रीमहादेव जी बोले – इस प्रकार तत्त्वदर्शी मुनि दधीचि के अनेक प्रकार से समझाने पर भी प्रजापति दक्ष ने उन परमेश्वर शिव को असदाचार से रहित नहीं माना और वे बार-बार उन महादेव के प्रति निन्दास्पद वचन बोलते रहे।।19-20।। नारद ! वे प्रजापति दक्ष पुत्री सती को उलाहना देते हुए ऎसा कहकर रोने लगे – हा वत्से ! सति ! पुत्री ! तुम मेरे प्राण के समान हो, मुझे शोकसमुद्र में निमग्न करके मेरा परित्याग कर तुम कहाँ जा रही हो? बहुमूल्य पर्यंक पर शयन करने योग्य सर्वांग सुन्दरी पुत्री ! कुरूप पति के साथ तुम श्मशान भूमि में कैसे रहोगी? ।।21-22½।। उनका यह वचन सुनकर मुनिश्रेष्ठ दधीचि ने अपने हाथ से उनके नेत्रों के आँसू पोंछते हुए तथा प्रिय वचनों से उन्हें सांत्वना प्रदान करते हुए पुन: कहा – ।।23-24।।
दधीचि बोले – ज्ञानियों में श्रेष्ठ प्रजापति! आप मूर्खों की भाँति क्यों रो रहे हैं? महात्मन् ! देवेश्वर शम्भु को समग्र रूप से जानकर भी आपका अज्ञान नष्ट नहीं हुआ, यह बड़े ही आश्चर्य की बात है!।।25।। पृथ्वी पर, जल में, आकाश में और रसातल में जो भी नर तथा नारी रूप प्राणी हैं, वे सभी उन्हीं दोनों (शिव-शिवा) – के रूप में उत्पन्न हैं – ऎसा आप पवित्र मन से समझ लीजिए।।26।। प्रजापति ! आप इन महेश्वर को यथार्थ रूप से साक्षात अनादि परमपुरुष के रूप में जान लीजिए और इन सती को त्रिगुणात्मिका, चिदात्मस्वरूपिणी परात्पर प्रकृति के रूप में ही समझिए।।27।।
इन परात्पर सती को भाग्यवश अपनी पुत्री रूप में तथा विश्वेश्वर शिव को उनके पति के रूप में प्राप्त करके भी यदि आप अपना सौभाग्य नहीं मानेंगे तो विधाता के द्वारा ठगे गये आपको बहुत सन्ताप होगा।।28।। प्रजापति ! इस सचाई को सुनो, शोक से व्याकुल तथा कल्याण की इच्छा रखने वाले तुम सती को प्रकृति के रूप में तथा शिव को परमपुरुषरूप में जान लो।।29।।
दक्ष बोले – मुनीश्वर ! आप यह सत्य कह रहे हैं कि मेरी पुत्री सती प्रकृतिरूपा है और शिव ही सनातन पुरुष तथा तीनों लोकों के ईश्वर हैं. मुनिश्रेष्ठ ! यह सुनकर भी मेरी बुद्धि दृढ़तापूर्वक वैसी नहीं हो पा रही है कि महेश्वर से बढ़कर दूसरा देवता नहीं है. सत्य बोलने वाले ऋषिगण भी यद्यपि यही कहते हैं, फिर भी शम्भु ही सर्वश्रेष्ठ देव हैं – ऎसा मेरा निश्चय नहीं है।।30-32।। [मुने !] मैं जिस लिए शिव की निन्दा कर रहा हूँ, उसका कारण सुनिए. पूर्वकाल में जब मेरे पिता ब्रह्माजी ने प्रजाओं की सृष्टि की, तब ग्यारह रुद्रों का प्रादुर्भाव हुआ था. समान शरीर वाले वे सभी रुद्र महात्मा, प्रचण्ड पराक्रमी, भीषण रूप वाले तथा क्रोध के कारण लाल आँखों वाले थे. वे सभी व्याघ्र चर्म धारण किए हुए थे तथा उनके सिरों पर जटाएँ सुशोभित हो रही थी।।33-35।।
वे सभी रुद्र ब्रह्माजी की सृष्टि का लोप करने हेतु तत्पर हो गए. तब सृष्टि के लोप के लिए उद्यत उन रुद्रों को देखकर ब्रह्माजी ने आज्ञा देकर उन्हें शान्त किया और मुझसे जोर देकर कहा – भयंकर कर्म वाले ये रुद्र जिस भी तरह से शान्त हो जाएँ, तुम शीघ्र ही वैसा उपाय करो. पुत्र ! मेरी आज्ञा से तुम इन्हें वश में करो. ब्रह्माजी के इस प्रकार के वचन से भयभीत वे सभी भीषण पराक्रम वाले रुद्र मेरे अधीन हो गाए और उनका बल तथा पराक्रम क्षीण हो गया. महामुने ! उसी समय से मुझमें शिव के प्रति अनादरभाव उत्पन्न हो गया है।।36-39।।
मेरी आज्ञा के अधीन रहने वाले प्रचण्ड पराक्रमी ये रुद्र जिसके अंश से उत्पन्न हैं, मेरे समक्ष उसकी क्या श्रेष्ठता है?।।40।। मेरी पुत्री सती रूप तथा गुण से जिस प्रकार की है, उसे तो आप भली भाँति जानते ही हैं, अब मैं आपसे और क्या कहूँ? क्या मेरी आज्ञा के अधीन रहने वाला शिव उस कन्या के योग्य वर हो सकता है?।।41½।। सत्पात्र को दिया गया दान पुण्य और यश बढ़ाने वाला होता है. इसलिए बुद्धिमान पुरुष को चाहिए कि योग्य पात्र देखकर ही उसे अपनी कन्या प्रदान करे.
महामुने ! बन्धु-बान्धवों को साथ में लेकर वर के रूप, स्वभाव तथा कुल पर सम्यक विचार करने के बाद ही प्राज्ञ पुरुष को अपनी कन्या सत्पात्र को देनी चाहिए।।42-43½।। इन्हीं सभी बातों पर विचार करके मैंने पूर्व में सती के स्वयंवर में कुल तथा शील से रहित उस शिव को आमन्त्रित नहीं किया था. सुनिए, मेरे मन में जो कुछ भी है, उसे आपको साफ-साफ बता रहा हूँ. जिसके अंश से मेरी आज्ञा के वशीभूत ये महारुद्र उत्पन्न हुए हैं, वह शिव जब तक इनके साथ मेरे पास आता रहेगा तब तक मैं उनके प्रति ईर्ष्या रखूँगा, यह सच-सच कह रहा हूँ. जब ये शम्भु उस विद्वेष का फल प्रदान करने में समर्थ हो जाएँगे, तभी मैं उनकी पूजा करूँगा, यह मेरी दृढ़् प्रतिज्ञा है।।44-47।।
श्रीमहादेवजी बोले – दक्ष का यह वचन सुनकर वे मुनीश्वर दधीचि अपने मन में सोचने लगे कि भवानी तथा शिव ने इस महामूर्ख प्रजापति दक्ष को निश्चय ही अपनी कृपा से वंचित कर दिया है।।48।।
जो लोग मन, वाणी और कर्म से सती और महेश्वर का आश्रय ग्रहण करते हैं, वे भी मोह में पड़ जाने के कारण उन्हें भली-भाँति जानने में समर्थ नहीं हो पाते, तब यह मूढ़मति(दक्ष) समझाया जा सकता तो भला इस संसार में कौन मुक्ति प्राप्त नहीं कर लेता?।।50।। मुने ! ऎसा सोचकर और फिर बिना कुछ बोले मुनि दधीचि अपने आश्रम को चले गए. इसके बाद दक्ष प्रजापति दु:ख से बार-बार लंबी-लंबी साँसें लेते हुए अपने भवन में प्रविष्ट हो गए।।51।।
महाभागवत – देवीपुराण – छठा अध्याय
इस अध्याय में सती के साथ भगवान शिव का हिमालय पर्वत पर आना, सभी देवों का हिमालय पर विवाहोत्सव में पहुँचना, नन्दी द्वारा हिमालय पर आकर शिव की स्तुति करना और शंकर द्वारा उनको प्रमथाधिपतिपद प्रदान करना आदि बातों का वर्णन है.
श्रीमहादेव जी बोले – हिमालय के श्रेष्ठ शिखर पर सती के साथ महादेवजी के आ जाने पर सभी देवगण भी वहाँ पहुँच गए. महर्षिगण, देवपत्नियाँ, सर्प, गन्धर्व एवं हजारों किन्नरियाँ वहाँ पहुँच गईं. सखियों के साथ मेरुदुहिता गिरीन्द्रवनिता मेनका तथा मुनिपत्नियाँ भी वहाँ आ गईं. परम आह्लादित देवताओं ने आकाश से पुष्पवृष्टि की. मुख्य अप्सराएँ नाचने लगीं और श्रेष्ठ गन्धर्व गान करने लगे ।।1-4।। सभी स्त्रियाँ समारोहपूर्वक विवाह से संबंधित मांगलिक कृत्य करने लगीं और सभी प्रमथगणों ने प्रसन्न होकर भगवान शंकर एवं सती को प्रणाम किया और वे ताली बजा-बजाकर नाचने तथा गीत गाने लगे।।5½।।
तदनन्तर सभी श्रेष्ठ देवगण सती और देवेश भगवान शंकर को प्रणाम कर तथा उनकी अनुज्ञा प्राप्त कर अपने-अपने स्थान को चले गए. मुनिश्रेष्ठ ! उसी प्रकार अन्य सभी लोग प्रसन्नतापूर्वक अपने-अपने स्थान को चले गए तथा मेना आदि स्त्रियाँ भी चली गईं।।6-7½।। परम सुन्दरी, कोमलांगी सती को देखकर मेना मन में सोचने लगीं कि जिसकी यह पुत्री है वह माता धन्य है ! मैं प्रतिदिन यहाँ आकर सुमुखी सती की आराधना करके पुत्री-भाव से इसे प्राप्त करने की प्रार्थना करूँगी, इसमें संशय नहीं है।।8-9½।। इस प्रकार गिरिराजपत्नी मेना मन में विचार करके त्रिलोकमाता अम्बिका को कभी भी नहीं भूल पाई. शंकरप्रिया सती के घर प्रतिदिन आकर वे उनके प्रति परम स्नेहभाव से प्रीति बढ़ाने लगीं।।10-11½।। तदनन्तर एक बार बुद्धिमानों में श्रेष्ठ, ज्ञानी और शिवभक्त नन्दी, जो दक्ष की सेवा में थे, वहाँ आए और उन्होंने भगवान महेश को भूमि पर गिरकर दण्डवत प्रणाम किया।।12-13।।
वे बोले – देवाधिदेव ! प्रभो ! मैं प्रजापति दक्ष का सेवक और ब्रह्मर्षि दधीचि का शिष्य हूँ, जो आपके प्रभाव को जानने वाले संत हैं. देवेश ! शरणागतवत्सल ! आप मुझे मोहित मत कीजिए. मैं आपको साक्षात परमेश्वर और परमात्मा के रूप में जानता हूँ. मैं सृष्टि, स्थिति और संहारकारिणी भगवती सती को मूल प्रकृति के रूप में जानता हूँ।।14-15½।। इस प्रकार कहकर नन्दी ने भक्तों पर कृपा करने वाले भगवान शंकर का अपनी परम भक्तिपूर्ण गद्गद वाणी से स्तवन किया।।16-17।।
नन्दी बोले – शिव ! आप त्रिलोकी के आदि परम पुरुष हैं और समस्त जगत के सृष्टि, पालन एवं संहारा करने वाले भी आप ही हैं. देवश्रेष्ठ ! वरदायक भवानीपति ! आप ऎश्वर्ययुक्त, युवक, वृद्ध और एकमात्र ब्रह्म हैं।।18।। हिमधवलकान्ति से युक्त, शशि समूह को पराजित करने वाला और अर्धचन्द्र धारण किए, चन्द्रमा के समान पाँच मुखोंवाला सुन्दर आपका स्वरुप अचिन्त्य है. निर्मल नागमणि से सुशोभित सर्परूपी आभूषण को सिर पर धारण करने वाले और ब्रह्मादि देवताओं के द्वारा पूजित युगचरण कमल वाले आपको मैं नमस्कार करता हूँ।।19।। इस पृथ्वी पर जो व्यक्ति निरन्तर भक्ति अथवा अभक्तिपूर्वक भी आपकी नित्य पूजा करते हैं, आपके नामों का संकीर्तन करते हैं और आपके मन्त्र का निरन्तर जप करते हैं, वे आपके चरणों की संनिधि प्राप्त कर निरन्तर स्वर्ग में रमण करते हैं. प्रभो ! पशुपति ! आप देवाधिदेव को छोड़कर दीनों पर दया करने वाला और कौन है?।।20।।
श्रीमहादेवजी बोले – मुने ! नन्दी की ऎसी स्तुति सुनकर भगवान शंकर उससे बोले – नन्दी ! तुम्हारी क्या इच्छा है, माँगो. वह मैं तुम्हें देता हूँ।।21।। नन्दी ने कहा – जगदीश्वर ! मैं आपका हमेशा निकट रहने वाला दास बना रहूँ और अपनी आँखों से नित्य आपके दर्शन करता रहूँ, यही आपसे याचना करता हूँ।।22।। शिवजी बोले – वत्स ! जो तुमने माँगा है, निश्चित रूप से वही होगा. अवश्य ही तुम हमेशा मेरे समीप निवास करोगे।।23।। पृथ्वी पर जो मानव इस स्तोत्र से भक्तिपूवक मेरी स्तुति करेंगे, उनका तीनों लोकों में कभी अशुभ नहीं होगा. इस मृत्युलोक में दीर्घकाल तक रहकर वे अन्त में मोक्ष प्राप्त करेंगे।।24।। महामते ! तुम मेरे इन प्रमथगणों के अधिपति होकर मेरे इस शिवलोक में निवास करो, नन्दी ! तुम मेरे प्रिय भक्त हो।।25-26।।
श्रीमहादेव जी बोले – मुनिश्रेष्ठ ! इस प्रकार वर प्राप्त करके भगवान शंकर के प्रभाव से नन्दी शिव के गणों के अधिपति हो गए।।27।।
।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीशिव-नारद-संवाद में “नन्दिकेश्वरप्रमथाधिपत्ववर्णन” नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ।।

महाभागवत देवीपुराण – सातवाँ अध्याय
इस अध्याय में भगवती सती तथा भगवान शिव का आनन्द विहार, दक्ष द्वारा यज्ञ करने और उसमें शंकर को न बुलाने का निश्चय करना, महर्षि दधीचि द्वारा दक्ष की निन्दा, नारद जी द्वारा सती को पिता के यज्ञ में जाने के लिए प्रेरित करना आदि बातें हैं.
श्रीमहादेव जी बोले – नारद! भगवान शंकर भगवती सती को प्राप्त कर अत्यन्त कामार्त हो गये और उन्होंने प्रमथगणों तथा महान बलशाली नन्दी से कहा – ।।1।। प्रमथगण ! मेरी आज्ञा से यहाँ से शीघ्र कुछ दूर जाकर तुम लोग देर तक स्थित हो जाओ. जब तुम लोगों को याद करुंगा, तब तुम लोग मेरे पास आ जाना. मेरी आज्ञा के बिना कोई भी यहाँ कदापि नहीं आएगा।।2-3।। भगवान शंकर का यह वचन सुनकर वे सभी प्रमथगण उनका सांनिध्य त्याग कर कुछ दूरी पर स्थित हो गये.।।4।। महामुने ! उसके बाद भगवान शंकर सती के साथ उस निर्जन वन में दिन-रात यथारुचि रमण करने लगे।।5।।
एक बार उन्होंने वन के फूलों को लाकर उनकी सुन्दर माला बनाई तथा सती को समर्पित कर वे कौतूहलपूर्वक उन्हें देखने लगे. कभी वे प्रेमवश खिले हुए कमल की तरह सती के सुन्दर मुख को आदरपूर्वक हाथ से सहलाते थे और कभी इच्छानुसार पर्वत की कन्दराओं में, कभी पुष्प वाटिका में तथा कभी सरोवर के किनारे रमण करते थे. इस प्रकार भगवान शंकर सती के अतिरिक्त तथा भगवती सती शिव के अतिरिक्त एक पल भी दूसरी ओर दृष्टि नहीं डालते थे।।6-9।।
नारद! भगवान शंकर भगवती सती के साथ कभी कैलास पर्वत पर चले जाते थे तो कभी उस श्रेष्ठ हिमालय पर्वत के जिस किसी शिखर पर सती के साथ फिर पहुँच जाते थे. महामते ! इस प्रकार सती के साथ विहार करते हुए भगवान शंकर को दस हजार वर्ष व्यतीत हो गये तथा उन्हें दिन-रात का भी भान न रहा. इस प्रकार अपनी माया से महादेव को मोहित करके त्रैलोक्य-मोहिनी भगवती सती हिमालय के शिखर पर विराजती रहीं।।10-12½।। मेनका भगवती सती के पास नित्य जाकर उचित समय जानकर भक्तिपूर्वक निरन्तर उन्हें पुत्रीरूप में पाने की प्रार्थना करती थीं. हिमवान की पत्नी मेनका ने शुक्ल पक्ष की महाष्टमी के दिन उपवासपूर्वक व्रत का आरम्भ किया. पुन: एक वर्ष तक शुक्ल पक्ष की महाष्टमी के दिन विधिपूर्वक भगवती सती की पूजा करके पुन: महाष्टमी को उपवास करके व्रत का समापन किया।।13-15½।। तब शंकर की भार्या सती ने प्रसन्न होकर यह अंगीकार कर लिया कि “मैं आपकी पुत्री के रूप में आविर्भूत होऊँगी, इसमें संदेह नहीं है”।।16½।।
सती का यह वचन सुनकर मेनका का चित्त प्रसन्न हो गया. वे दिन-रात सती का ध्यान करके हिमालय के भवन में रहने लगी थीं।।17½।। नारद ! वे दक्ष अज्ञानवश प्रतिदिन शंकर की निन्दा करते थे और शंकरजी भी उन प्रजापति दक्ष को सम्मान का पात्र नहीं मानते थे. मुनिश्रेष्ठ ! शिव तथा प्रजापति दक्ष के बीच एक-दूसरे के प्रति इस प्रकार का महान अद्भुत वैमनस्य हो गया।।18-19½।।
मुने ! एक बार ब्रह्मापुत्र नारद ने दक्ष प्रजापति के यहाँ आकर उनसे यह बात कहीं – प्रजापते! आप जिन महेश्वर की प्रतिदिन निन्दा करते हैं, वे उससे कुपित होकर जो करना चाहते हैं, उसे आप सुन लीजिए – वे शिव अपने भूतगणों के साथ आपके नगर में आकर भस्म तथा हड्डियों की वर्षा करके निश्चय ही कुलसहित आपका नाश कर देंगे. आपसे स्नेह के कारण ही मैंने आपसे यह बताया है, इसे आप कभी प्रकाशित ना करें. अब आप अपने विद्वान मन्त्रियों के साथ इसके उपाय के लिए विचार-विमर्श कीजिए. ऎसा कहकर वे नारद आकाश मार्ग से अपने स्थान को चले गये।।20-24।।
इधर दक्ष प्रजापति ने सभी मन्त्रियों को बुलाकर यह कहा – “मन्त्रिगण ! आप लोग तो सदा से मेरा हित करने वाले रहे हैं, किंतु मेरे शत्रु के क्रियाकलाप का किसी ने ध्यान नहीं रखा”. महर्षि नारद ने मेरे पास आकर ऎसा कहा है – शिव अपने समस्त भूतगणों के साथ मेरे पुर में आकर भस्म, हड्डी और रक्त की वृष्टि करेगा, इसमें संदेह नहीं है. तो फिर इस संबंध में मुझे इस समय जो करना हो उसे आप लोग बतलाइए।।25-27।। महामुने ! दक्ष की यह बात सुनकर वे सभी मन्त्री भय से व्याकुल हो उठे और उनसे यह वचन कहने लगे – ।।28½।।
मन्त्रियों ने कहा – देवाधिदेव शिव ऎसा क्यों करेंगे? हम लोग उनकी इस अनीति का कारण नहीं समझ पा रहे हैं. आप तो बुद्धिमानों में श्रेष्ठ तथा सभी शास्त्रों के ज्ञाता हैं. आप यथोचित आज्ञा दीजिए. इसके बाद हम लोगों के द्वारा कल्याणकारी साधनानुष्ठान किए जाएँगे।।29-30½।।
दक्ष बोले – श्मशान में निवास करने वाले तथा भूतगणों के अधिपति शिव को छोड़कर अन्य सभी देवताओं को बुलाकर मैं यज्ञ का आयोजन करुँगा और समस्त विघ्नों का नाश करने वाले यज्ञेश्वर भगवान विष्णु को संरक्षक बनाकर मैं प्रयत्नपूर्वक यज्ञ संपन्न करूँगा. इस प्रकार पुण्य यज्ञ का आरंभ हो जाने पर वह भूतपति शिव मेरे पुण्यकर्मयुक्त नगर में कैसे आ पाएगा?।।31-33½।।
श्रीमहादेवजी बोले – [नारद!] तब दक्ष प्रजापति के ऎसा कहने पर भय के कारण उन मन्त्रियों ने दक्ष प्रजापति से कहा – महाराज! यह ठीक ही है. तत्पश्चात क्षीरसागर के तट पर पहुँचकर दक्ष प्रजापति ने भगवान विष्णु से यज्ञ की रक्षा के लिए प्रार्थना की. तब परम पुरुष भगवान विष्णु प्रसन्न होकर यज्ञ की रक्षा करने के लिए उन दक्ष के पुर में स्वयं पहुँच गये।।34-36½।।
उसके बाद दक्ष ने इन्द्र आदि प्रधान देवताओं, ब्रह्मा, देवर्षियों, प्रधान ब्रह्मर्षियों, प्रधान यक्षों, गन्धर्वों, पितरों, दैत्यों, किन्नरों तथा पर्वतों को निमन्त्रित किया. मुने ! दक्ष ने उस यज्ञमहोत्सव में सभी को तो बुलाया था, किंतु विद्वेष के कारण शिव को तथा उनकी पत्नी सती को छोड़ दिया था।।37-39।।
दक्ष प्रजापति ने उन सभी लोगों से कहा – मैंने अपने यज्ञमहोत्सव में शिव तथा उनकी प्रिय पत्नी सती को नहीं बुलाया है. जो लोग इस यज्ञ में नहीं आयेंगे वे यज्ञभाग से वंचित हो जाएँगे. स्वयं सनातन परम पुरुष भगवान विष्णु मेरे यज्ञ की रक्षा के लिए यहाँ आए हुए हैं. इसलिए आप सभी लोग भयमुक्त होकर मेरे यज्ञ में आइए।।40-42।।
इस प्रकार उन दक्ष का वचन सुनकर भयभीत हुए देवता आदि सभी शिवविहीन होने पर भी उस यज्ञ सभा में आ गये।।43।। यज्ञ की रक्षा करने में तत्पर भगवान विष्णु को आया हुआ सुनकर सभी देवता तथा अन्य भी शिवकोप से भयरहित हो गये।।44।।
दक्ष ने सती को छोड़कर अदिति आदि सभी पुत्रियों को आदरपूर्वक बुलाकर उन्हें पुष्कल वस्त्र और आभूषणों से संतुष्ट किया।।45।। मुने! उन्होंने यज्ञ के निमित्त महान पर्वत के समान अन्नों का संचय किया एवं दूध, दही, घी आदि की बड़ी-बड़ी नदियाँ बहा दीं. इस प्रकार प्रजापति दक्ष ने यज्ञ के लिए जो-जो वस्तु तथा द्रव्य अपेक्षित थे, उनका संचय कर डाला. उन्होंने रससामग्रियों का सागर सदृश तथा अन्य पदार्थों का पर्वत सदृश संचय कर दिया. उसके बाद यज्ञ आरंभ हुआ।।46-47 ।।½।।
मुनिश्रेष्ठ ! उस यज्ञ में स्वयं पृथ्वी वेदी बनीं और यज्ञकुण्ड में ऊर्ध्व तथा निर्मल शिखावाले धूमरहित अग्निदेव स्वयं प्रज्वलित हुए।।48½।। जो लोग उस यज्ञ में वेद पाठ के लिए नियुक्त किए गये थे, वे सब के सब आसन पर विराजमान हो गये. महामते ! यज्ञ की रक्षा करने वालों के स्वामी, जगत के रक्षक, आदि, परम पुरुष तथा यज्ञस्वरुप साक्षात भगवान नारायण यज्ञवेदी पर प्रतिष्ठित हो गये।।49-50½।।
इस प्रकार यज्ञ आरंभ हो जाने पर ज्ञानियों में श्रेष्ठ महामति दधीचि ने वहाँ एकमात्र शिव को न देखकर दक्ष से ऎसा कहा – ।।51½।।
दधीचि बोले – महान बुद्धिवाले प्रजापति ! आप जिस प्रकार का यह यज्ञ कर रहे हैं, वैसा न तो कभी हुआ है और न कभी होगा. ये सभी देवता इस यज्ञ में स्वयं ही साक्षात प्रकट होकर अपने-अपने यज्ञ-भाग से आहुति ग्रहण कर रहे हैं. इस यज्ञ में सभी प्राणी तो आए हुए दिखाई दे रहे हैं, किंतु देवताओं के अधिपति शम्भु क्यों नहीं दिख रहे हैं?।।52-54½।।
दक्ष बोले – मुनिश्रेष्ठ ! मैंने उन महेश्वरों को इस यज्ञ में बुलाया नहीं था. अत: वे इस पुण्य यज्ञ में नहीं दिखाई दे रहे हैं।।55½।।
दधीचि बोले – प्रजापति ! जैसे विविध रत्नों से भली-भाँति विभूषित होने पर भी प्राणविहीन शरीर बिलकुल सुशोभित नहीं होता, वैसे ही महेश्वर के बिना आपका यह यज्ञ श्मशान की भाँति दिखाई दे रहा है।।56-57।।
दक्ष बोले – दुष्ट ब्राह्मण ! तुम्हें यहाँ किसने बुलाया है और तुम यहाँ क्यों आये हो? तुमसे किसने पूछा है, जो तुम इस प्रकार बोल रहे हो?।।58।।
दधीचि बोले – मैं तुम्हारे इस अनिष्टकारी यज्ञ में तुम्हारे द्वारा बुलाया जाऊँ या ना बुलाया जाऊँ, किंतु यदि मेरी बात मानो तो सदाशिव महादेव को बुला लो; क्योंकि शिवविहीन किया गया यज्ञ फलदायक नहीं होता है. जिस प्रकार अर्थ से रहित वाक्य, वेदज्ञान से शून्य ब्राह्मण तथा गंगा से रहित देश व्यर्थ होता है, उसी प्रकार शिव के बिना यज्ञ निष्फल होता है. जैसे पति के बिना स्त्री का और पुत्र के बिना गृहस्थ का जीवन व्यर्थ है और जैसे निर्धनों की आकाँक्षा व्यर्थ है, वैसे ही शिव के बिना यज्ञ व्यर्थ है. जिस प्रकार कुशविहीन संध्या-वंदन, तिलविहीन तर्पण और हवि से रहित होम निष्फल होता है, उसी प्रकार शम्भुविहीन यज्ञ भी निष्फल होता है, उसी प्रकार शम्भुविहीन यज्ञ भी निष्फल होता है।।59-62½।।
जो विष्णु हैं वे ही महादेव हैं और जो महादेव हैं, वे ही स्वयं नारायण विष्णु हैं. इन दोनों में से कभी भी कहीं कोई भेद नहीं है. इस प्रकार जो इनकी निन्दा करता है, वह स्वयं ही निन्दित होता है. इनमें किसी एक की निन्दा करने वाले से दूसरा कभी प्रसन्न नहीं होता. शिव को अपमानित करने की कामना से युक्त होकर तुम जो यह यज्ञ कर रहे हो, इससे अत्यन्त कुपित होकर वे शम्भु तुम्हारा यज्ञ नष्ट कर देंगे।।63-65½।। दक्ष बोले – संपूर्ण जगत की रक्षा करने वाले भगवान विष्णु जिस यज्ञ के रक्षक हैं, उस यज्ञ में वह श्मशानवासी शम्भु मेरा क्या कर लेगा? प्रेतभूमि(श्मशान)- से प्रेम रखने वाला वह शिव यदि मेरे यज्ञ में आएगा तो भगवान विष्णु अपने चक्र से तुम्हारे शिव को रोक लेंगे।।66-67½।।
दधीचि बोले – ये अविनाशी पुरुष भगवान विष्णु तुम्हारी तरह मूर्ख नहीं हैं, जो कि विमोहित होकर तुम्हारे लिए स्वयं युद्ध करेंगे. जिन विष्णु को तुम भगवान शिव से यज्ञ की रक्षा के लिए यहाँ आया हुआ देख रहे हो, वे जिस प्रकार यज्ञ की रक्षा करेंगे उसे तुम अपनी आँखों से शीघ्र ही देखोगे।।68-69½।।
श्रीमहादेवजी बोले – उन दधीचि की यह बात सुनकर क्रोध से अत्यन्त लाल नेत्रों वाले दक्ष ने अपने अनुचरों से यह कहा – “इस ब्राह्मण को यहाँ से दूर ले जाओ”. मुनिश्रेष्ठ दधीचि भी उस दक्ष की बात पर हँस पड़े और बोले – “अरे मूढ ! तुम मुझे क्या दूर करोगे, तुम तो स्वयं ही अपने कल्याण से दूर हो गये हो. दुर्मति ! भगवान शिव के क्रोध से उत्पन्न दण्ड तुम्हारे सिर पर शीघ्र ही गिरेगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।।70-72½।। ऎसा कहकर मध्याह्नकालीन सूर्य के समान तेज संपन्न तथा क्रोध से लाल नेत्रों वाले मुनिश्रेष्ठ दधीचि सभा के मध्य से निकल गये. तत्पश्चात शिव तत्त्व को जानने वाले दुर्वासा, वामदेव, च्यवन, गौतम आदि समस्त ऋषिगण भी वहाँ से उठकर चल दिए. उन सभी ऋषियों के चले जाने पर दक्ष ने शेष ब्राह्मणों को दूनी दक्षिणा देकर महान यज्ञ आरंभ किया।।73-75½।।
नारद ! सभी बन्धु-बांधवों के कहने पर भी उस दक्ष ने सती को यज्ञ में किसी प्रकार नहीं बुलाया. उससे अत्यन्त क्षीणपुण्य वाले दक्ष ने उस परा प्रकृति का घोर अपमान किया. दक्ष प्रजापति तो उसी समय महामायास्वरूपिणी जगदम्बा के द्वारा ठग लिए गये।।76-77½।। इसके बाद गिरिराज हिमालय पर भगवान शिव के पास विराजमान सर्वज्ञा जगदम्बिका वह सब बातें जान गईं और वे विचार करने लगीं।।78½।।
मुझे पुत्री रूप में प्राप्त करने के लिए गिरिराज हिमालय की पत्नी मेना ने विनम्रतापूर्वक प्रेम भाव से सच्ची भक्ति के साथ मेरी प्रार्थना की थी. मैंने उसे स्वीकार कर लिया था कि “मैं उनकी पुत्री के रूप में निस्संदेह जन्म लूँगी.” उसी प्रकार पूर्वकाल में जब दक्ष प्रजापति ने मुझे पुत्री रूप में पाने के लिए मुझसे प्रार्थना की थी, तब मैंने उनसे कहा था कि “जब मेरे प्रति आपका आदरभाव कम हो जाएगा, तब आपका पुण्य क्षीण हो जाएगा. उस समय अपनी माया से आपको मोहित करके मैं निश्चित रूप से आपका त्याग कर दूँगी”. तो अब वह समय आ गया है. इस समय मेरे प्रति अनादरभाव वाले दक्ष प्रजापति का पुण्य नष्ट हो चुका है, अत: अपनी लीला से उनका परित्याग कर मैं अपने स्थान को चली जाऊँगी. तदनन्तर हिमालय के घर में जन्म लेकर एकमात्र प्राणवल्लभ देवेश महेश्वर शिव को पतिरूप में पुन: प्राप्त करूँगी।।79-84।।
इस प्रकार अपने मन में विचार करके दक्षपुत्री महेश्वरी सती उस क्षण की प्रतीक्षा करने लगी जब दक्ष के यज्ञ का विनाश होगा।।85।। उसी समय ब्रह्मापुत्र नारद दक्ष के घर से वहीं पर आ गये, जहाँ भगवान शिव विराजमान थे।।86।। तीन नेत्रों वाले देवाधिदेव शिव की तीन बार परिक्रमा करके नारद ने कहा – “उस दक्ष ने अपने उस महायज्ञ में सभी को बुलाया है, देवता, मनुष्य, गन्धर्व, किन्नर, नाग, पर्वत तथा अन्य जो भी प्राणी स्वर्ग-मृत्युलोक और रसातल में हैं – उन सभी को उसने बुलाया है, केवल आप दोनों (शिव-सती) को ही छोड़ दिया है. उस प्रजापति दक्ष की पुरी को आप दोनों से रहित देखकर उसका परित्याग करके दु:खी मन से मैं आपके पास आया हूँ. आप दोनों का वहाँ जाना उचित है. अत: अब आप विलम्ब मत कीजिए”।।87-90।।
शिवजी बोले – [देवर्षे ! ] हम दोनों के वहाँ जाने का प्रयोजन ही क्या है? जैसी उनकी रुचि हो, उसके अनुसार वे प्रजापति दक्ष अपना यज्ञ करें।।91।।
नारदजी बोले – यदि वे दक्ष आपके अपमान की इच्छा करते हुए वह महान यज्ञ संपन्न करते हैं तो इससे आपके प्रति लोगों में अनादर का भाव उत्पन्न हो जाएगा. परमेश्वर ! यह जान करके आप या तो अपना यज्ञ भाग ग्रहण कीजिए अथवा सुरेश्वर ! उस यज्ञ में ऎसा विघ्न डालिए ताकि वह संपन्न न हो सके।।92-93।।
शिवजी बोले – वहाँ न मैं जाऊँगा और न तो मेरी प्राणप्रिया यह सती ही जाएगी. वहाँ पहुँचने पर भी वे दक्ष मुझे यज्ञ भाग नहीं देंगे।।94।।
श्रीमहादेवजी बोले – तब शिवजी के ऎसा कहने पर महर्षि नारद ने सती से कहा – जगज्जननी ! उस यज्ञ में आपका जाना तो उचित है. अपने पिता के घर में यज्ञमहोत्सव होने का समाचार सुनकर कोई कन्या धैर्य धारण कर घर में भला कैसे रह सकती है ! जो आपकी सभी दिव्य बहनें हैं, वे यज्ञ में आयी हुई हैं और दक्ष ने उन सभी को स्वर्ण आदि के अनेकविध आभूषण प्रदान किए हैं. सुरेश्वरि ! जगदम्बिके ! अभिमान के कारण जिस प्रकार उन्होंने एकमात्र आपको नहीं बुलाया है, उसी प्रकार आप भी उनके घमण्ड को नष्ट करने का प्रयत्न कीजिए. मान तथा अपमान के प्रति समभाव वाले परम योगी शिव न तो उनके यज्ञ में जाएँगे और न तो विघ्न ही पैदा करेंगे।।95-99।। तदनन्तर दक्ष पुत्री सती से ऎसा कहकर महर्षि नारद ने शिवजी को प्रणाम करके पुन: दक्ष-प्रजापति के घर के लिए प्रस्थान किया ।।100।।
।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीशिव-नारद-संवाद में “दक्षप्रजापतियज्ञारम्भवर्णन” नामक सातवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।

महाभागवत – देवी पुराण – आठवाँ अध्याय
इस अध्याय में भगवान शंकर द्वारा सती का दक्ष के घर जाने को अनुचित बताना, देवी सती के विराट रूप को देखकर शंकर का भयभीत होना, सती द्वारा काली, तारा आदि अपने दस स्वरूपों (दस महाविद्याओं) को प्रकट करना, देवी का यज्ञ-भूमि के लिए प्रस्थान आदि का वर्णन है.
श्रीमहादेव जी बोले – मुनीश्वर नारद का यह वचन सुनकर दक्ष की पुत्री तथा शिव की भार्या सती ने पिता के यज्ञ में जाने का मन बना लिया और उन्होंने शिवजी से कहा – ।।1।।
सती बोली – प्रभो! देव! महेश्वर! मेरे पिता दक्ष-प्रजापति बहुत तैयारी के साथ एक बहुत बड़ा यज्ञ कर रहे हैं. उस यज्ञ में हम दोनों का जाना मेरे मन में न्यायोचित प्रतीत हो रहा है. हम दोनों के वहाँ उपस्थित हो जाने पर वे निश्चित रूप से सम्मान करेंगे।।2-3।।
शिवजी बोले – प्रिय सती! इस प्रकार का विचार अपने मन में भी मत लाओ. बिना बुलाए जाना और मृत्यु – ये दोनों ही एक समान है.. यक्ष विद्याधरों के समक्ष वे अहंकारी दक्ष मेरा तिरस्कार कर रहे हैं. अत: उनके घर कभी नहीं जाना चाहिए. मेरा अपमान करने की इच्छा से ही वे यह महायज्ञ कर रहे हैं. सती! यदि मैं वहाँ जाऊँगा अथवा तुम वहाँ जाओगी तो तुम्हारे पिता हम दोनों का सम्मान नहीं करेंगे।।4-6½।।
यदि श्वसुर के घर में अपनी प्रतिष्ठा हो, तभी वहाँ जाना चाहिए. यदि वहाँ मेरा अपमान होता हो तब वहाँ का जाना मरने से भी बढ़कर होता है. दामाद श्वसुर के घर में परम आदर की अपेक्षा रखता है. श्वसुर को भी चाहिए कि वह उस दामाद का आदर करके अपने भवन में ले आवे. वरानने! श्वसुर को अपने दामाद के प्रति अनादर भाव नहीं रखना चाहिए, अन्यथा धर्म की हानि होती है, यह बात पूर्ण रूप से सत्य है. दामाद के प्रति द्वेष भावना रखने से घोर पाप उत्पन्न होता है. अत: बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि वह अपने दामाद के प्रति द्वेष न रखे. दामाद को भी अपने श्वसुर का किसी तरह का अप्रिय नहीं करना चाहिए. ऎसा करने वाला नरक में जाता है और कई सौ वर्षों तक नरक में पड़ा रहता है. बिना सम्मान के ससुराल कभी नहीं जाना चाहिए. प्रिये! बिना बुलाए जहाँ-कहीं भी जाना मृत्यु के तुल्य कहा गया है, फिर ससुराल में जाने की बात ही क्या? अत: इस समय मैं श्वसुर के घर नहीं जाऊँगा. वहाँ जाना प्रीतिकारक नहीं होगा, क्योंकि वे दक्ष प्रजापति हैं।।7-14।।
सती ! श्वसुर के स्नेह करने से रूपवृद्धि, प्रजावृद्धि और धर्मवृद्धि भी होती है और प्रिये! अनादर करने से सर्वथा हानि ही होती है. अत: सुरोत्तमे ! मैं तुम्हारे पिता के इस यज्ञ में नहीं जाऊँगा. वे प्रजापति दक्ष मुझे दिन-रात दरिद्र तथा अत्यन्त दु:खी कहते रहते हैं. बिना बुलाए मेरे जाने पर तो वे विशेष रूप से ऎसा कहेंगे. न बुलाना तथा दुर्वचन – ये बातें श्वसुर के घर में सहनीय नहीं है. श्वसुर को चाहिए कि वह अपनी पुत्री के पति को आते हुए देखते ही उसके पास पहुँचकर यथाशक्ति उसकी पूजा करें, अन्यथा धर्म की हानि होती है. जिस ससुराल में इस-इस प्रकार के सम्मान की बात कही गई है, वहाँ अपमान पाने के लिए भला कौन बुद्धिमान जाएगा. अत: देवताओं के द्वारा पूजित महेशानि! मुझे क्षमा करो, बिना निमन्त्रण के तुम्हारे पिता के महायज्ञ में हम दोनों का जाना उचित नहीं है।।15-20½।।
सती बोली – प्रभो! आपने जो कुछ कहा, वह सत्य ही है. इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं है, किंतु हो सकता है कि वहाँ जाने पर वे आपका सम्मान करें।।21½।।
शिवजी बोले – तुम्हारे पिता वैसे नहीं हैं, जो कि बिना निमन्त्रण के वहाँ जाने पर वे सभा के मध्य में हम दोनों को सम्मानपूर्वक स्वीकार करें. मेरे नाम के स्मरण मात्र से वे दिन-रात मेरी निन्दा करते रहते हैं. ऎसी स्थिति में वे मेरा सम्मान करेंगे, यह तुम्हारी दुर्बुद्धि है।।22-23½।।
सती बोली – महादेव ! आप जाएँ अथवा ना जाएँ, आपकी जो इच्छा हो कीजिए. किंतु महेश्वर! मैं वहाँ जाऊँगी. अत: आप मुझे अनुमति दीजिए. पिता के घर में महायज्ञ के महोत्सव का समाचार सुनकर कोई कन्या धैर्य रखकर अपने घर में कैसे रह सकती है? जहाँ असमान्य लोग बुलाए जाते हैं और पूजित होते हैं, तब वहाँ सामान्य व्यक्ति भला इसे सुनकर कैसे धैर्य रख सकता है? महेश्वर! किसी दूसरे स्थान पर जाने के लिए निमन्त्रण की अपेक्षा होती है, अपने पिता के घर जाने के लिए कन्या को आमन्त्रण की कोई अपेक्षा नहीं होती है. अत: मैं पिता के घर अवश्य जाऊँगी, इसके लिए आप अनुमति दीजिए. वहाँ मेरे जाने पर यदि पिताजी मेरा सम्मान करेंगे तो मैं उनसे कहकर आपके लिए भी आहुति दिलवा दूँगी. यदि वे मूढ़बुद्धि दक्ष मेरे सामने आपकी निन्दा करेंगे तो मैं उसी समय उनके महायज्ञ का नि:संदेह विध्वंस कर डालूँगी।।24-30।।
शिवजी बोले – सती ! उस यज्ञ में तुम्हारा जाना कभी भी उचित नहीं है. मैं सच कहता हूँ कि वहाँ पर तुम्हारा सम्मान नहीं होगा. तुम्हारे पिता तुम्हारे लिए मेरी असह्य निन्दा करेंगे. उसे सुनकार अपने प्राणों को छोड़ दोगी, उसका तुम क्या कर लोगी।।31-32।।
सती बोली – महादेव ! मैं आपसे सच-सच कह दे रही हूँ कि अपने पिता के घर अवश्य ही जाऊँगी, इसके लिए आप आज्ञा दें अथवा न दें।।33।।
शिवजी बोले – मेरे वचनों का उल्लंघन कर तुम बार-बार अपने पिता के घर जाने की बात क्यों कह रही हो? वहाँ जाने का प्रयोजन क्या है? इसे सही और स्पष्ट रूप से बता दो, तब मैं उसका उत्तर पुन: दूँगा. जिन दुरात्माओं को अनादर का भय नहीं रहता, वे ही उन स्थानों पर जाते हैं जहाँ अपमान की संभावना रहती है. सती! सम्मान के योग्य व्यक्ति को सम्मान न करने वाले के घर कभी नहीं जाना चाहिए क्योंकि उस अपूजक के द्वारा की गई वह पूजा, पूजा नहीं कही जाती. मेरी निन्दा सुनने में यदि तुम्हें सुख नहीं मिलता, तो मेरे निन्दक के घर जाने की इच्छा तुम क्यों कर रही हो।।34-37।।
सती बोली – शम्भो ! आपकी निन्दा सुनने में मुझे कोई सुख नहीं है. उस निन्दा की सुनने की मेरी कोई अभिलाषा भी नहीं है, किंतु फिर भी मैं वहाँ जाना चाहती हूँ. महेशान ! जिस समय मेरे पिता ने केवल आपको छोड़ अन्य सभी देवताओं को बुलाकर महायज्ञ आरंभ किया, उसी समय आपका अपमान हो गया और उसे प्रजा देख भी रही है. यदि मेरे पिता दक्ष आपका अनादर करके अभिमानपूर्वक इस महायज्ञ को संपन्न कर लेते हैं तो इस पृथ्वी तल पर कोई भी मनुष्य श्रद्धा से युक्त होकर आपको आहुति नहीं देगा. इसलिए आप आज्ञा दीजिए या न दीजिए मैं वहाँ अवश्य जाऊँगी और वहाँ या तो आपके लिए यज्ञभाग प्राप्त करूँगी अथवा यज्ञ का नाश कर डालूँगी।।38-42।। श्रीशिवजी बोले – महादेवी ! मेरे रोकने पर भी तुम मेरी बात नहीं सुन रही हो. दुर्बुद्धि व्यक्ति स्वयं निषिद्धाचरण करके दूसरे पर दोषारोपण करता है. दक्षपुत्री ! अब मैंने जान लिया कि तुम मेरे कहने में नहीं रह गई हो. अत: अपनी रुचि के अनुसार तुम कुछ भी करो, मेरी आज्ञा की प्रतीक्षा क्यों कर रही हो?।।43-44।।
श्रीमहादेवजी ने कहा – [नारद!] तब महेश्वर के ऎसा कहने पर क्रोध के मारे लाल-लाल आँखों वाली वे दक्षपुत्री सती क्षण भर के लिए सोचने लगीं कि “इन शंकर ने पहले तो मुझे पत्नी रूप में प्राप्त करने हेतु प्रार्थना की थी और फिर मुझे पा लेने के बाद अब ये मेरा अपमान कर रहे हैं इसलिए अब मैं इन्हें अपना प्रभाव दिखाती हूँ.” तदनन्तर उन भगवान शिव ने क्रोध से फड़कते हुए ओंठो वाली तथा कालाग्नि के समान नेत्रों वाली उन भगवती सती को देखकर अपन नेत्र बंद कर लिए।।45-47।।
भयानक दाढ़ों से युक्त मुख वाली भगवती ने सहसा उस समय अट्टहास किया, जिसे सुनकर महादेव विमूढ़ के समान भयाक्रान्त हो गए. बड़ी कठिनाई से आँखों को खोलकर उन्होंने भगवती के भयानक रूप को देखा. नारद ! उनके द्वारा इस प्रकार देखी जाने पर उन भगवती ने सहसा अपने स्वर्णिम वस्त्रों का परित्याग करके वृद्धावस्था के समान कान्ति को धारण कर लिया. वे दिगम्बरा थी. उनके केशपाश सुशोभित हो रहे थे, जिह्वा लपलपा रही थी, उनकी चार भुजाएँ थीं. उनके शरीर की ज्योति कालाग्नि के समान सुशोभित हो रही थी, रोमराशि पसीने से व्याप्त थी, अत्यन्त भयंकर स्वरूपवाली वे भयानक शब्द कर रही थीं और उन्होंने मुण्डमाला का आभूषण धारण कर रखा था. उगते हुए करोड़ों सूर्य के समान तेजोमयी उन्होंने अपने मस्तक पर चन्द्र रेखा धारण कर रखी थी. उगते हुए सूर्य के समान आभा वाले किरीट को धारण करने से उनका ललाट देदीप्यमान था।।48-52।।
इस प्रकार अपने तेज से देदीप्यमान एवं भयानक रूप धारण करके देवी सती घोर गर्जना के साथ अट्टहास करती हुई उन शम्भु के समक्ष उठकर सहसा खड़ी हुईं।।53।। तब उन सती को इस प्रकार का विचित्र कार्य करती हुई देखकर भगवान शिव ने चित्त से धैर्य का परित्याग कर भय के मारे भागने का निश्चय किया और वे विमूढ़ की भाँति सभी दिशाओं में इधर-उधर भागने लगे।।54।। उन शिव को दौड़ते हुए देखकर वे दक्षपुत्री सती उन्हें रोकने के लिए ऊँचे स्वरों में “डरो मत, डरो मत” – इन शब्दों का बार-बार उच्चारण करती हुई अत्यन्त भयानक अट्टहास कर रही थीं।।55।। उस शब्द को सुनकर वे शिव अत्यधिक डर के मारे वहाँ एक क्षण भी नहीं रुके. वे उस समय भय से व्याकुल होकर दिशाओं में दूर तक पहुँच जाने के लिए बड़ी तेजी से भागे जा रहे थे।।56।।
इस प्रकार अपने स्वामी को भयाक्रान्त देखकर वे दयामयी भगवती सती उन्हें रोकने की इच्छा से क्षण भर में अपने दस श्रेष्ठ विग्रह धारण करके सभी दिशाओं में उनके समक्ष स्थित हो गयीं।।57।। अत्यन्त वेग से भागते हुए वे शिवजी जिस-जिस दिशा में जाते थे, उस-उस दिशा में उन्हीं भयानक भगवती को देखते थे और फिर भय से व्याकुल होकर अन्य दिशा में भागने लगते थे।।58।।
तब किसी भी दिशा को भयमुक्त न पाकर वे भगवान शिव अपनी आँखें बंद करके वहीं ठहर गए और इसके बाद जब उन्होंने अपनी आँखें खोली तब कमल के समान सुन्दर मुखवाली, हासयुक्त मुखमण्डलवाली, दो उन्नत उरोजों वाली, दिगम्बर, भयानक तथा विशाल नेत्रों वाली, खुले हुए केशों वाली, करोड़ों सूर्यों के समान तेज धारण करने वाली, चार भुजाओं से युक्त तथा दक्षिण दिशा की ओर मुख करके स्थित श्यामा भगवती काली को अपने सामने स्थित देखा।।59-60।। इस प्रकार उन भगवती को देखकर अत्यन्त डरे-डरे से भगवान शिव बोले – श्यामवर्ण वाली आप कौन हैं और मेरी प्राणप्रिया सती कहाँ चली गई?।।61।।
सती बोलीं – महादेव ! क्या अपने सम्मुख स्थित मुझ सती को आप नहीं देख रहे हैं? काली, तारा, लोकेशी कमला, भुवनेश्वरी, छिन्नमस्ता, षोडशी, त्रिपुरसुन्दरी, बगलामुखी, धूमावती और मातंगी – इन देवियों के ये नाम हैं।।62-63।।
शिवजी बोले – जगत का पालन करने वाली देवी ! यदि आप मुझ पर अति प्रसन्न हैं तो किस देवी का क्या नाम है और उनकी क्या विशेषता है – यह सब आप मुझे अलग-अलग बताइए।।64।।
देवी बोलीं – कृष्णवर्णा तथा भयानक नेत्रों वाली ये जो देवी आपके सामने स्थित हैं, वे भगवती “काली” है और जो ये श्यामवर्ण वाली देवी आपके ऊर्ध्वभाग में विराजमान हैं, वे साक्षात् महाकालस्वरुपिणी महाविद्या “तारा” हैं।।65½।।
महामते ! आपके दाहिनी ओर ये जो भयदायिनी तथा मस्तकविहीन देवी विराजमान हैं, वे महाविद्यास्वरुपिणी भगवती “छिन्नमस्ता” हैं. शम्भो ! आपके बायीं ओर ये जो देवी हैं, वे भगवती “भुवनेश्वरी” हैं. जो देवी आपके पीछे स्थित है, वे शत्रुनाशिनी भगवती “बगला” हैं. विधवा का रूप धारण की हुई ये जो देवी आपके अग्निकोण में विराजमान हैं, वे महाविद्यास्वरुपिणी महेश्वरी “धूमावती” हैं और आपके नैऋत्यकोण में ये जो देवी हैं, वे भगवती “त्रिपुरसुन्दरी” हैं. आपके वायव्यकोण में जो देवी हैं, वे मातंगकन्या महाविद्या “मातंगी” हैं और आपके ईशानकोण में जो देवी स्थित हैं, वे महाविद्यास्वरूपिणी महेश्वरी “षोडशी” हैं. मैं तो भयंकर रूपवाली “भैरवी” हूँ. शम्भो ! आप भय मत कीजिए. ये सभी रूप भगवती के अन्य समस्त रूपों से उत्कृष्ट हों।।66-71।।
महेश्वर ! ये देवियाँ नित्य भक्तिपूर्वक उपासना करने वाले साधक पुरुषों को चारों प्रकार के पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष) तथा समस्त वांछित फल प्रदान करती हैं. इन्हीं की कृपा से मारण, उच्चाटन, क्षोभन, मोहन, द्रावण, वशीकरण, स्तम्भन और विद्वेष आदि अन्य प्रकार के वांछित प्रयोग भी सिद्ध होते हैं. ये सभी गोपनीय महाविद्याएँ हैं, इनका प्रकाशन कभी नहीं करना चाहिए।।72-73½।।
महेश्वर ! उन देवियों के मन्त्र, यन्त्र, पूजन, हवनविधि, पुरश्चर्याविधान, स्तोत्र तथा कवच और उनके उपासकों के आचार, नियम आदि का वर्णन आप ही करेंगे, क्योंकि विभो ! इस विषय में आपसे बड़ा अन्य कोई वक्ता नहीं है. आपके द्वारा दिया गया उपदेश आगमशास्त्र के नाम से लोक में प्रसिद्ध होगा।।74-76।।
शंकर ! आगम तथा वेद – ये तीनों ही मेरी दो भुजाएँ हैं. उन्हीं दोनों से मैंने स्थावर-जंगममय संपूर्ण जगत को धारण कर रखा है. जो मूर्ख इन दोनों (वेद तथा आगम) – का मोहवश कभी भी उल्लंघन करता है, वह मेरे हाथों से च्युत होकर अध:पतित हो जाता है, इसमें संदेह नहीं है. वे दोनों ही कल्याण के हेतु हैं तथा अत्यन्त दुरूह, दुर्घट और विद्वानों के द्वारा भी कठिनाई से जाने जाते हैं एवं उनका आद्यन्त भी नहीं है. जो मनुष्य आगम अथवा वेद का उल्लंघन कर अन्यथा आचरण करता है, उसका उद्धार करने में सर्वथा असमर्थ हूँ, यह सत्य है और इसमें कोई भी संशय नहीं है. इन दोनों की एकता पर सम्यक विवेचन करके बुद्धिमान व्यक्ति को धर्म का आचरण करना चाहिए और कभी भी अज्ञानतावश इन दोनों में भेद नहीं मानना चाहिए ।।77-81।।
इन महाविद्याओं के जो साधक हैं, वे लोक में वैष्णव माने जाते हैं और मुझमें समर्पित अन्त:करण वाले वे प्रशान्तात्मा हो जाते हैं. स्वयं गुरु के द्वारा दिए गए मन्त्र, यन्त्र तथा कवच को सावधानीपूर्वक गुप्त रखना चाहिए और उसे जहाँ कहीं भी प्रकाशित नहीं करना चाहिए. उसे प्रकाशित करने से सिद्धि की हानि होती है तथा अशुभ होता है. अत: उत्तम साधक को चाहिए कि पूरे प्रयत्न के साथ उसे गोपनीय रखें।।82-84।। महादेव ! महामते ! आपके द्वारा यह करणीय कर्म मैंने आपसे कहा, क्योंकि मैं आपकी प्रियतमा हूँ और आप भी मेरे अत्यंत प्रिय पति हैं. अपने पिता दक्ष प्रजापति के अभिमान के विनाश के लिए मैं आज वहाँ जाऊँगी. अत: देवेश ! यदि आप वहाँ नहीं चल रहे हैं तो मुझे ही जाने की आज्ञा दीजिए. देव ! यही मेरा अभीष्ट है और आपका भी. अत: यदि आप मुझे अनुमति दे दें तो मैं अपने पिता दक्षप्रजापति के यज्ञ के विध्वंस के लिए चली जाऊँ।।85-87।। श्रीमहादेवजी बोले – [नारद!] उन भगवती का यह वचन सुनकर शिव डरे-डरे से खड़े रहे और फिर उन्होंने भयानक नेत्रों वाली उन देवी काली से कहा – ।।88।।
शिवजी बोले – मैं आपको पूर्णा, परमेशानी तथा पराप्रकृति के रूप में जान गया हूँ. अत: अज्ञानवश आपको न जानते हुए मैंने जो कुछ कहा है, उसे क्षमा करें. आप आद्या हैं, परा विद्या हैं तथा सभी प्राणियों में विराजमान हैं. आप स्वतन्त्र रहने वाली परमा शक्ति हैं. अत: कोई भी कार्य करने या न करने के लिए आपको आदेश देने वाला कौन है? शिवे ! प्रजापति दक्ष के यज्ञनाश के लिए यदि आप जाएँगी तो मेरी कौन-सी शक्ति आपको रोकने में समर्थ है और मैं भी आपको कैसे रोक सकूँगा. महेशानि ! पतिभाव से मैंने आपको जो भी अप्रिय वचन कहा है, उसे आप क्षमा करें और आपकी जो रुचि हो, वैसा करें।।89-92।।
श्रीमहादेवजी बोले – [नारद!] तब महेश के ऎसा कहने पर थोड़ी-सी मुसकान से युक्त मुखमण्डल वाली उन जगदम्बिका ने यह वचन कहा – ।।93।।
देव ! महेश्वर ! आप अपने समस्त प्रमथगणों के साथ यहीं रहिए और मैं अपने पिता के घर यज्ञ देखने के लिए इसी समय जा रही हूँ।।94।। नारद ! महादेव से ऎसा कहकर वे भगवती तथा ऊर्ध्व दिशा में स्थित देवी तारा – ये दोनों अचानक एकरूप हो गयीं. तदनन्तर अन्य आठों मूर्त्तियाँ (देवियाँ) भी सहसा अन्तर्धान हो गयीं।।95½।। इसके बाद भगवान शिव ने उन सुरेश्वरी को जाने की इच्छुक देखकर अपने प्रमथगणों से कहा – दस हजार सिंहों से युक्त तथा रत्नजालों से सुशोभित उत्तम रथ ले आओ।।96-97।। उसे सुनते ही स्वयं प्रमथगणों के अधिपति उसी क्षण तेज गति से चलने वाले दस हजार सिंहों से जुते हुए रथ को ले आए।।98।। प्रथमाधिपति ने रत्नजाल से सुशोभित, पर्वताकार, चारों ओर से अनेक प्रकार की पताकाओं से अलंकृत तथा वायुवेग के समान चलने वाले दस हजार सिंहों से जुते हुए उस रथ पर उन भगवती को स्वयं विराजमान कराया।।99-100।।
मुनिश्रेष्ठ ! युग के अन्त में प्रलय के समान सम्पूर्ण जगत को भयभीत करने वाली वे भीमस्वरुपिणी भगवती काली उस रथ में स्थित होकर सुमेरू पर्वत के शिखर पर आरुढ़ उत्तम मेघमाला की भाँति सुशोभित हो रही थीं. तदनन्तर बुद्धिमान नन्दी उस रथ को बड़ी तेजी से हाँकने लगे और महामते ! इधर वे शिव शोक तथा दु:ख से व्याकुल हो रुदन करने लगे।।101-102½।।
कोपाविष्ट काली को देखकर सभी प्राणी भागने लगे, सूर्य भी भयभीत होकर पृथ्वी पर गिरने-से लगे, सागर विक्षुब्ध हो गए, सभी दिशाएँ व्याकुल हो उठीं, महान वेग से वायु बहने लगी और घोर अमंगल का संकेत देने वाले सैकड़ों उल्कापिण्ड सूर्यमण्डल का भेदन कर पृथ्वी तल पर गिरने लगे।।103-105।।
इस प्रकार वह रथ आधे क्षण में ही दक्षप्रजापति के घर पहुँच गया. तब उन भगवती सती को देखते ही दक्ष के घर में स्थित सभी लोग भयभीत हो उठे।।106।।
।।इस प्रकार श्रीमहाभागवतमहापुराण के अन्तर्गत श्रीमहादेव-नारद-संवाद में “कालीरथागमन” नामक आठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।