वैशाख माहात्म्य के संबंध में तीन प्रेतों के उद्धार की कथा

वैशाख माहात्म्य के विषय में प्राचीन इतिहास भी कहा गया है, जिसमें एक ब्राह्मण का घने वन के भीतर प्रेतों के साथ संवाद हुआ था। मध्यप्रदेश में एक धनशर्मा नामक ब्राह्मण रहता था, उसमें पाप का लेश मात्र भी नहीं था। एक दिन वह कुश आदि के लिए वन में गया। वहाँ उसने एक अद्भुत बात देखी। उसे तीन महाप्रेत दिखाई दिए जो बड़े ही दुष्ट और भयंकर थे। धनशर्मा उन्हें देखकर डर गया। उन प्रेतों के केश ऊपर को उठे हुए थे। लाल-लाल आँखें, काले-काले दाँत और सूखा हुआ उनका पेट था।
धनशर्मा ने पूछा – तुम लोग कौन हो? यह नारकी अवस्था तुम्हें कैसे प्राप्त हुई? मैं भय से आतुर और दु:खी हूँ, दया का पात्र हूँ, मेरी रक्षा करो। मैं भगवान विष्णु का दास हूँ, मेरी रक्षा करने से भगवान तुम लोगों का भी कल्याण करेंगे। भगवान विष्णु ब्राह्मणों के हितैषी हैं, मुझ पर दया करने से वे तुम्हारे ऊपर संतुष्ट होगें। श्रीविष्णु का अलसी के पुष्प के समान श्याम वर्ण है, वे पीताम्बरधारी हैं, उनका नाम श्रवण करने मात्र से सब पापों का क्षय हो जाता है। भगवान आदि और अन्त से रहित, शंख, चके एवं गदा धारण करने वाले, अविनाशी, कमल के समान नेत्रों वाले तथा प्रेतों को मोक्ष प्रदान करने वाले हैं।
यमराज कहते हैं – ब्रह्मन् ! भगवान विष्णु का नाम सुनने मात्र से वे पिशाच संतुष्ट हो गए। उनका भाव पवित्र हो गया। वे दया और उदारता के वशीभूत हो गए। ब्राह्मण के कहे हुए वचन से उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई थी। उसके पूछने पर वे प्रेत इस प्रकार बोले।
प्रेतों ने कहा – विप्र ! तुम्हारे दर्शनमात्र से तथा भगवान श्रीहरि का नाम सुनने से हम इस समय दूसरे ही भाव को प्राप्त हो गए। हमारा भाव बदल गया, हम दयालु हो गए। वैष्णव पुरुष का समागम निश्चय ही पापों को दूर भगाता है, कल्याण से संयोग कराता तथा शीघ्र ही यश का विस्तार करता है। अब हम लोगों का परिचय सुनो। यह पहला ‘कृतघ्न’ नाम का प्रेत है, इस दूसरे का नाम ‘विदैवत’ है तथा तीसरा मैं हूँ, मेरा नाम ‘अवैशाख’ है, मैं तीनों में अधिक पापी हूँ। इस प्रथम पापी ने सदा ही कृतघ्नता की है, अत: इसके कर्म के अनुसार ही इसका नाम कृतघ्न पड़ा है। ब्रह्मन् ! यह पूर्व जन्म में ‘सुदास’ नामक द्रोही मनुष्य था, सदा कृतघ्नता किया करता था, उसी पाप से यह इस अवस्था को पहुँचा है। अत्यन्त पापी, धूर्त तथा गुरु और स्वामी का अहित करने वाले मनुष्य के लिए भी पापों से छूटने का उपाय है, परन्तु कृतघ्न के लिए कोई प्रायश्चित नहीं है(अतिपापिनि धूर्ते च गुरुस्वाम्यहितेSपि वा । निष्कृतिर्विद्यते विप्र कृतघ्ने नास्ति निष्कृति:।। 94।60)।
इस दूसरे पापी ने देवताओं का पूजन किए बिना ही सदा अन्न भोजन किया है, इसने गुरु और ब्राह्मणों को कभी दान नहीं दिया है, इसलिए इसका नाम “विदैवत” हुआ है। यह पूर्वजन्म में “हरिवीर” नाम से विख्यात राजा था। दस हजार गाँवों पर इसका अधिकार था। यह रोष, अहंकार तथा नास्तिकता के कारण गुरुजनों की आज्ञा का उल्लंघन करने में तत्पर रहता था। प्रतिदिन पंचमहायज्ञों का अनुष्ठान किए बिना ही खाता और ब्राह्मणों की निन्दा किया करता था। उसी पापकर्म के कारण यह बड़े-बड़े नरकों का कष्ट भोगकर इस समय “विदैवत” नामक प्रेत हुआ है।
“अवैशाख” नामक तीसरा प्रेत मैं हूँ। मैं पूर्वजन्म में ब्राह्मण था। मध्यप्रदेश में मेरा जन्म हुआ था। मेरा नाम गौतम था और गोत्र भी गौतम ही था। मैं ‘वासपुर’ गाँव में निवास करता था। मैंने माधवमास में भगवान माधव की प्रसन्नता के उद्देश्य से ककभी स्नान नहीं किया। दान और हवन भी नहीं किया। विशेषत: वैशाख मास से संबंध रखने वाला कोई कर्म नहीं किया। वैशाख में मधुसूदन का पूजन नहीं किया तथा विद्वान पुरुषों को दान आदि से संतुष्ट नहीं किया। वैशाख मास की किसी भी पूर्णिमा को जो पूर्ण फल प्रदान करने वाली है, मैंने स्नान, दान, शुभ कर्म, पूजा तथा पुण्य के द्वारा उसके व्रत का पालन नहीं किया। इससे मेरा सारा वैदिक फल निष्फल हो गया। मैं “अवैशाख” नामक प्रेत होकर सब ओर विचरता हूँ।

हम तीनों के प्रेत योनि में पड़ने का जो कारण है, वह सब मैंने तुम्हें बता दिया। अब तुम हम लोगों का पाप से उद्धार करो क्योंकि तुम विप्र हो। ब्रह्मन् ! पुण्यात्मा साधु पुरुष तीर्थों से भी बढ़कर हैं। वे शरण में आये हुए माहन पापियों को भी नरक से तार देते हैं। जो मनुष्य सदा गंगा आदि संपूर्ण तीर्थों में स्नान करता है तथा जो केवल साधु पुरुषों का संग करता है, उनमें साधु-संग करने वाला पुरुष ही श्रेष्ठ है(गंगादिसर्वतीर्थेषु यो स्नाति सर्वदा । य: करोति सतां संगं तयो: सत्संगमो वर:) 94।76।
अत: तुम मेरा उद्धार करो अथवा मेरा एक पुत्र है, जो धनशर्मा नाम से विख्यात है, स्वामिन् ! तुम उसी के पास जाकर ये सब बातें समझाओ। हमारे लिए इतना परिश्रम करो। जो दूसरो का कार्य उपस्थित होने पर उसके लिए उद्योग करता है, उसे उसका फल मिलता है। वह यज्ञ, दान और शुभ कर्मों से भी अधिक फल का भागी होता है।
यमराज कहते हैं – ब्रह्मन् ! उस प्रेत का वचन सुनकर धनशर्मा को बड़ा दु:ख हुआ। उसने यह जान लिया कि ये मेरे पिता हैं जो नरक में पड़े हुए हैं तब वह सर्वथा अपनी निन्दा करते हुए बोला।
धनशर्मा ने कहा – स्वामिन् ! मैं ही गौतम का – आपका पुत्र धनशर्मा हूँ। मैं आपके किसी काम ना आया, मेरा जन्म निरर्थक है। जो पुत्र आलस्य छोड़कर अपने पिता का उद्धार नहीं करता, वह अपने को पवित्र नहीं कर पाता। जो इस लोक और परलोक में भी सुख का संतान – विस्तार कर सके, वही संतान या तनय मान गया है। इस लोक में धर्म की दृष्टि से पुरुष के दो ही गुरु हैं – पिता और माता। इनमें भी पिता ही श्रेष्ठ है क्योंकि सर्वत्र बीज की ही प्रधानता देखी जाती है। पिताजी ! क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? कैसे आपकी गति होगी? मैं धर्म का तत्त्व नहीं जानता, केवल आपकी आज्ञा का पालन करुँगा।
प्रेत बोला – बेटा ! घर जाओ और यमुना में विधिपूर्वक स्नान करो। आज से पाँचवें दिन वैशाख की पूर्णिमा आने वाली है जो सब प्रकार की उत्तम गति प्रदान करने वाली तथा देवता और पितरों के पूजन के लिए उपयुक्त है। उस दिन पितरों के निमित्त भक्तिपूर्वक तिलमिश्रित जल, जल का घड़ा, अन्न औरर फल दान करना चाहिए। उस दिन जो श्राद्ध किया जाता है, वह पितरों को हजार वर्षों तक आनन्द प्रदान करने वाला होता है। जो वैशाख की पूर्णिमा को विधिपूर्वक स्नान करके दस ब्राह्मणों को खीर का भोजन कराता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है।
जो धर्मराज की प्रसन्नता के लिए जल से भरे हुए सात घड़े दान करता है, वह अपनी सात पीढ़ियों को तार देता है। बेटा! त्रयोदशी, चतुर्दशी तथा पूर्णिमा को भक्तिपरायण होकर स्नान, जप, दान, होम और श्रीमाधव का पूजन करो और उससे जो फल हो, हम लोगों को समर्पित कर दो। ये दोनों प्रेत भी मेरे परिचित हो गए हैं, अत: इनको इसी अवस्था में छोड़कर मैं स्वर्ग में नहीं जा सकता। इन दोनों के पाप का भी अन्त आ गया है। यमराज कहते हैं – ब्रह्मन् ! “बहुत अच्छा” कहकर वह श्रेष्ठ ब्राह्मण अपने घर गया और वहाँ जाकर उसने सब कुछ उसी तरह किया। वह प्रसन्नतापूर्वक परम भक्ति के साथ वैशाख स्नान और दान करने लगा। वैशाख की पूर्णिमा आने पर उसने आनन्दपूर्वक भक्ति से स्नान किया और बहुत से दान करके उन सबको पृथक – पृथक पुण्य प्रदान किया। उस पवित्र दान के संयोग से वे सब आनन्दमग्न हो विमान पर बैठकर तत्क्षण ही स्वर्ग को चले गए।
ब्राह्मणों में श्रेष्ठ धनशर्मा भी श्रुति, स्मृति और पुराणों का ज्ञाता था। वह चिरकाल तक उत्तम भोग भोगकर अन्त में ब्रह्मलोक को प्राप्त हुआ। अत: यह वैशाख की पूर्णिमा परम पुण्यमयी और समस्त विश्व को पवित्र करने वाली है। इसका माहात्म्य नहुत बड़ा है। अतएव मैंने संक्षेप से तुम्हें इसका महत्त्व बतला दिया है। जो वैशाख मास में प्रात:काल स्नान करके नियमों के पालन से विशुद्धचित्त हो भगवान मधुसूदन की पूजा करते हैं, वे ही पुरुष धन्य हैं, वे पुण्यात्मा हैं तथा वे ही संसार में पुरुषार्थ के भागी है।
जो मनुष्य वैशाख मास में सवेरे स्नान करके सम्पूर्ण यम-नियमों से युक्त हो भगवान लक्ष्मीपति की आराधना करता है वह निश्चय ही अपने पापों का नाश कर डालता है। जो प्रात:काल उठकर श्रीविष्णु की पूजा के लिए गंगाजी के जल में डुबकी लगाते हैं, उन्हीं पुरुषों ने समय का सदुपयोग किया है, वे ही मनुष्यों में धन्य तथा पाप रहित हैं।
वैशाख मास में प्रात:काल नियमयुक्त हो मनुष्य जब तीर्थ में स्नान करने के लिए पैर बढ़ाता है, उस समय श्रीमाधव के स्मरण और नाम कीर्तन से उसका एक-एक पग अश्वमेघ यज्ञ के समान पुण्य देने वाला होता है। श्रीहरि के प्रियतम वैशाख मास के व्रत का यदि पालन किय जाए तो यह मेरुपर्वत के समान बड़े उग्र पापों को भी जलाकर भस्म कर डालता है। विप्रवर ! तुम पर अनुग्रह होने के कारण मैंने यह प्रसंग संक्षेप से तुम्हें बता दिया है। जो मेरे कहे हुए इस इतिहास को भक्तिपूर्वक सुनेगा, वह भी सब पापों से मुक्त हो जाएगा तथा उसे मेरे लोक – यमलोक में नहीं आना पड़ेगा।
वैशाख मास के व्रत का विधिपूर्वक पालन करने से अनेकों बार के किए हुए ब्रह्महत्यादि पाप भी नष्ट हो जाते हैं – यह निश्चित बात है। वह पुरुष अपने तीस पीढ़ी पहले के पूर्वजों और तीस पीढ़ी बाद की संतानों को भी तार देता है क्योंकि अनायास ही नाना प्रकार के कर्म करने वाले भगवान श्रीहरि को वैशाख मास बहुत ही प्रिय है, अतएव वह सब मासों में श्रेष्ठ है।