वैशाख स्नान के नियम

महीरथ नाम का एक राजा था जो सदा कामनाओं में आसक्त और अजितेन्द्रिय था। वह केवल वैशाख स्नान के सुयोग से स्वत: वैकुण्ठधाम को चला गया। वैशाख मास के देवता भगवान मधुसूदन हैं। अतएव वह सफल मास है। वैशाख मास में भगवान की प्रार्थना का मन्त्र इस प्रकार है –
मधुसूदन देवेश वैशाखे मेषगे रवौ।
प्रात:स्नानं करिष्यामि निर्विघ्नं कुरु माधव।।
अर्थ – हे मधुसूदन ! हे देवेश्वर माधव ! मैं मेष राशि में सूर्य के स्थित होने पर वैशाख मास में प्रात: स्नान करुँगा, आप इसे निर्विघ्न पूर्ण कीजिए।
तत्पश्चात निम्नांकित मन्त्र से अर्घ्य प्रदान करना चाहिए –
वैशाखे मेषगे भानौ प्रात:स्नानपरायण:।
अर्घ्यं तेSहं प्रदास्यामि गृहाण मधुसूदन।।
अर्थ – सूर्य के मेष राशि पर स्थित रहते हुए वैशाख मास में प्रात: स्नान के नियम में संलग्न होकर मैं आपको अर्घ्य देता हूँ। मधुसूदन ! इसे ग्रहण कीजिए।
इस प्रकार अर्घ्य समर्पण करके स्नान करें फिर वस्त्रों को पहनकर संध्या तर्पण आदि सब कर्मों को पूरा करके वैशाख मास में विकसित होने वाले पुष्पों से भगवान विष्णु की पूजा करें। उसके बाद वैशाख मास के माहात्म्य को सूचित करने वाली भगवान विष्णु की कथा सुने। ऎसा करने से कोटि जन्मों के पापों से मुक्त होकर मनुष्य मोक्ष को प्राप्त होता है। यह शरीर अपने अधीन है, जल भी अपने अधीन ही है, साथ ही अपनी जिह्वा भी अपने वश में है। अत: इस स्वाधीन शरीर से स्वाधीन जल में स्नान करके स्वाधीन जिह्वा से “हरि” इन दो अक्षरों का उच्चारण करें। जो वैशाख मास में तुलसीदल से भगवान विष्णु की पूजा करता है, वह विष्णु की सायुज्य मुक्ति को पाता है। अत: अनेक प्रकार के भक्तिमार्ग से तथा भाँति-भाँति के व्रतों द्वारा भगवान विष्णु की सेवा तथा उनके सगुण या निर्गुण स्वरूप का अनन्य चित्त से ध्यान करना चाहिए।