सर्वनियंता परब्रह्म परमात्मा

( कठोपनिषद में एक सुन्दर आख्यायिका में कहा गया है - ''वहाँ सूर्य प्रकाशमान नहीं हो सकता तथा चन्द्रमा आभाहीन हो जाता है, समस्त तारागण ज्योतिहीन हो जाते हैं; वहाँ विद्युत् भी नहीं चमकती, न ही कोई पार्थिव अग्नि प्रकाशित होती है। कारण, जो कुछ भी प्रकाशमान् है, वह 'उस' की ज्योति की प्रतिच्छाया है, 'उस' की आभा से ही यह सब प्रतिभासित होता है।'')
एक समय देवासुर संग्राम में देवताओं की विजय हुई तो उनमें अहमभाव उत्पन्न हो गया। विजय का श्रेय लेने के लिये अग्नि , वायु आदि सभी देवता अपने - अपने पराक्रम का यशोगान करने लगे। देवताओं का इस प्रकार अहंकर बढ़ा हुआ देखकर सर्वनियन्ता परमात्मा ने सोचा कि अहंकार तो पतन का हेतु होता है ; इसलिए देवताओं को पतन से बचाने के लिए इनका अहंकार चूर्ण कर देना आवश्यक है।
जहाँ देवगण मिलकर अपनी - अपनी विभूतिगाथा गा रहे थे वहीं आकाश में एक विचित्र आकृति वाला यक्ष उत्पन्न हो गया - देवताओं की दृष्टि उस पर गई वे निश्चय न कर सके कि यह क्या है। सोचा कि कहीं कोई दैत्य तो नहीं है। उसका पता लगाने के लिए सबने अग्निदेव से कहा कि आप बड़े ही पराक्रमशाली हैं , आप ही जाकर पता लगाईये कि यह कौन है और यहाँ इसके आने का क्या कारण है। अग्निदेव यक्ष के निकट गये। यक्ष ने पूछा कि तुम कौन हो ? अग्नि ने बड़े गर्व से कहा -- मैं अग्नि हूँ और ' जातवेदा ' नाम से जगत् में विख्यात हूँ। इस प्रकार गर्वीला उत्तर सुनकर यक्ष ने एक तिनका अग्नि के समाने रख दिया और कहा कि इसे जला दो। अग्नि ने बार - बार प्रयत्न किया , अपनी पूरी शक्ति लगा दी , पर वह तृण जला नहीं। अग्नि लज्जित होकर वापिस लौट आये तब देवताओं को बड़ा आश्चर्य हुआ।
सब ने मिलकर वायु को प्रेरित किया ; कहा कि आप भी बड़े प्रभाव - शाली हैं , आप इसका पता अवश्य ही लगा लेंगे। वायुदेव यक्ष के निकट पहुँचे। यक्ष ने पूछा - तुम कौन है ? वायु ने कहा है - हम वायुदेव हैं। यक्ष ने पूछा - तुम्हारी क्या सामर्थ्य है ? वायु ने उत्तर दिया - मैं क्षण भर में समस्त भूमण्डल को यहाँ का वहाँ कर सकता हूँ ; चाहे जिसे चाहे जहाँ उड़ाकर फेक सकता हूँ। यक्ष ने वही तिनका वायु के सामने रख दिया और कहा - इसे उड़ा ले जाओ। वायु ने सरलता से उड़ाना चाहा , तिनका हिला तक नहीं , वायु ने अपना पूरा बल लगाया , पर तिनका उस स्थान से टसमस भी नहीं हुआ। वायु देव शिथिल होकर लौट आये।
सब देवता बड़े विस्मय और भय में पड़ गये। सब ने मिलकर इन्द्र से कहा - आप देवराज हैं , आप हम सब में बुद्धिमान् , यह कोई भयंकर आपत्ति हम लोगों पर आ रही है ; कृपा करके युक्तिपूर्वक ढंग से पता लगवाइए कि यह क्या है। इन्द्र अपना पराक्रम बटोरकर यक्ष के समीप पहुँचे। यक्ष ने इनकी इतनी अवहेलना की कि वह इनसे बोला तक नहीं। और वहीं अन्तर्ध्यान हो गया। तब इन्द्र का अभिमान जाता रहा। उसने विनम्र होकर भगवती का ध्यान किया और प्रार्थना की। तब विद्यादेवी ने उमा के रूप में प्रकट होकर इन्द्र को समझाते हुए कहा -

' यह यक्ष जो तुम लोगों के सामने प्रकट हुआ था वह सर्वनियन्ता परब्रह्म परमात्मा ही था ; उसी की सत्ता से समस्त जगत सत्तावान् है ; उसी की शक्ति से अग्नि , वायु आदि देवगण शक्तिमान होते हैं ; उसी के प्रकाश से सूर्य चन्द्र में प्रकाश है , उसी की शक्ति से ही आप लोग शक्तिमान् है ; यह जो आप लोगों की विजय हुई है वह उसी की विजय है। आप लोगों को अनावश्यक अहंकार हो गया था इसी हेतु से आपका दर्प - दलन करने के हेतु वह यक्ष के रूप में प्रकट हुआ था। आप लोगों को चाहिए कि जिसकी इच्छा के विरुद्ध एक तृण भी नहीं हिल सकता , जो सूर्य चन्द्र आदि सबको अपने प्रकाश से प्रकाशित कराता है उसी सर्वाधिष्ठान स्वप्रकाश परब्रह्म परमात्मा की ही प्रधानता मानें , व्यर्थ का अहंभाव अपने मन में न आने दें।'
विशेष ,,,,,,,
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्र तारकं
नैमा विद्युतो भान्ति कुतो'यम्-अग्निः
तमेव भान्तम्-अनुभाति सर्वं
तस्य भासा सर्वम्-इदम् विभाति]
वास्तव में सूर्य , चन्द्र , विद्युत आदि में जो प्रकाश है वह सूर्य , चन्द्र और विद्युत की सत्ता में नहीं है - इन सबका प्रकाशक सर्वाधिष्ठान शुद्ध - चैतन्य ब्रह्म ही है।
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भवसागर से पार होने के लिये मनुष्य शरीर रूपी सुन्दर नौका मिल गई है।
सतर्क रहो कहीं ऐसा न हो कि वासना की भँवर में पड़कर नौका डूब जाय।
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मानसिक मल या मन की मैल
जब मन विषयों में आसक्त रहता है तो उसे मानसिक मल कहते हैं। जब संसार की मोहमाया व विषयों से वैराग्य हो जाए तो उसे मन की निर्मलता कहते हैं।
मानसिक तीर्थ,,,
सत्यं तीर्थं क्षमा तीर्थं तीर्थमिन्द्रियनिग्रह:।।
सर्वभूतदया तीर्थं तीर्थमार्जवमेव च।
दान तीर्थं दमस्तीर्थं संतोषस्तीर्थमेव च।।
ब्रह्मचर्यं परं तीर्थं नियमस्तीर्थमुच्यते।
मन्त्राणां तु जपस्तीर्थं तीर्थं तु प्रियवादिता।।
ज्ञानं तीर्थं धृतिस्तीर्थमहिंसा तीर्थमेव च।
आत्मतीर्थं ध्यानतीर्थं पुनस्तीर्थं शिवस्मृति:।।
अर्थात्—सत्य तीर्थ है, क्षमा तीर्थ है, इन्द्रियनिग्रह तीर्थ है, सभी प्राणियों पर दया करना, सरलता, दान, मनोनिग्रह, संतोष, ब्रह्मचर्य, नियम, मन्त्रजप, मीठा बोलना, ज्ञान, धैर्य, अहिंसा, आत्मा में स्थित रहना, भगवान का ध्यान और भगवान शिव का स्मरण—ये सभी मानसिक तीर्थ कहलाते हैं।
शरीर और मन की शुद्धि, यज्ञ, तपस्या और शास्त्रों का ज्ञान ये सब-के-सब तीर्थ ही हैं। जिस मनुष्य ने अपने मन और इन्द्रियों को वश में कर लिया, वह जहां भी रहेगा, वही स्थान उसके लिए नैमिष्यारण, कुरुक्षेत्र, पुष्कर आदि तीर्थ बन जाएंगे।
अत: मनुष्य को ज्ञान की गंगा से अपने को पवित्र रखना चाहिए, ध्यान रूपी जल से राग-द्वेष रूपी मल को धो देना चाहिए और यदि वह सत्य, क्षमा, दया, दान, संतोष आदि मानस तीर्थों का सहारा ले ले तो जन्म-जन्मान्तर के पाप धुलकर परम गति को प्राप्त कर सकता है।
‘भगवान के प्रिय भक्त स्वयं ही तीर्थरूप होते हैं। उनके हृदय में भगवान के विराजमान होने से वे जहां भी विचरण करते हैं; वही महातीर्थ बन जाता है।,
’!! जय श्री राम , जय महावीर हनुमान !!
!! जय सर्वदेवमयी यज्ञेश्वरी गौमाता !!
" जीवन का सत्य आत्मिक कल्याण है ना की भौतिक सुख !"